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ओसीडी को ऐसे पहचानें

Symptoms of Obsessive Compulsive Disorder in Hindi

आज हम बात करेंगे एक ऐसी बीमारी की जो बहुत तेजी से बढ़ रही है और लोगों में इसके बारे में जानकारी का अभाव होना भी इसके ठीक होने में रुकावट बन रहा है। जी हां ओसीडी या हिन्‍दी में कहें तो वहम की बीमारी जिसके कारण ना सिर्फ ओसीडी से ग्रसित इंसान ही परेशान रहता है बल्कि उसके साथ और आसपास रहने वालों को भी उसके इस व्‍यवहार के कारण परेशानी उठानी पड़ती है। जरूरत है समय पर इसे पहचानने की जिससे उसके निवारण के लिए सही कदम उठाये जा सकें।



ओसीडी के कारण व्‍यक्ति का ना केवल निजी जीवन बल्कि पारिवारिक, सामाजिक और कामकाजी जीवन भी बुरी तरह प्रभावित या बाधित होने लगता है। इस बीमारी को आसानी से पहचानने का एक तरीका यह है कि लोग मजबूरन कुछ ऐसे कार्यों को बार बार दोहराने लगते हैं जिनसे उनको फौरी तौर पर राहत मिलती है, पर उनकी समस्या इससे ठीक नहीं होती बल्कि बढ़ती ही है। ओसीडी के लक्षणों की बात की जाए तो इसके बहुत तरह के लक्षण हो सकते हैं पर यहां हम कुछ मुख्‍य तरह के लक्षणों की बात करेंगे जिनसे इसको आसानी से पहचाना जा सकता है-

1- गंदगी का वहम- यह ओसीडी का एक बहुत ही कॉमन लक्षण है जिसमें प्रभावित व्‍यक्ति को गंदगी से संबंधित विचार आने लगते हैं और उससे बचने के लिए वह बार-बार हाथ धोना, बहुत देर तक हाथ धोते रहना, नहाना, गंदी चीजों को दूर से ही देखकर चिंतित होना, घर की बहुत ज्‍यादा साफ-सफाई, कपड़ों को बार बार धोना जैसे काम करने लगता है। गंदगी को लेकर लगातार चिंता के बने रहने के कारण वह सफाई को लेकर बहुत सचेत रहता है और किसी प्रकार की गंदगी या बीमारी का खतरा ना होने के बावजूद बार-बार सफाई करना उसकी आदत में शुमार हो जाता है।

2- चीजों को चेक करना- इस प्रकार की OCD में प्रभावित व्‍यक्ति को चीजों को चेक करने की आदत हो जाती है। उसे लगता है कि ताला तो नहीं खुला रह गया तो वह ताले को कई बार देखेगा कि ठीक से लगा है कि नहीं। गैस बंद है कि नहीं, गाड़ी लॉक की है या नहीं, दरवाजों को बार-बार देखने की आदत कि ठीक से बंद किये हैं या नहीं, बिजली के स्विच ऑफ किये हैं या नहीं।

3- किसी को नुकसान पहुंचाने का डर- इसमें व्‍यक्ति को लगता है कि वह किसी को कोई नुकसान ना पहुंचा दे। जैसे किसी महिला को बार-बार यह विचार आये कि वह अपने बच्‍चे को चाकू से चोट ना पहुंचा दे तो वह भी ओ सी डी की श्रेणी में ही आयेगा। किसी व्‍यक्ति को लगता है‍ कि वह साथ में बैठे व्‍यक्ति को चांटा ना मार दे और इस तरह के विचार आने पर वह बहुत परेशान हो जाता है।

4- धार्मिक ओसीडी- इससे ग्रस्‍त व्‍यक्ति को बार बार धर्म के या भगवान के या बड़े बुजुर्गों के प्रति खराब विचार आते हैं। ये विचार किसी भी तरह के हो सकते हैं जैसे सेक्‍स से संबंधित या भगवान के प्रतिअपशब्‍द या मूर्ति को गंदा ना कर दूं इस प्रकार के विचार इसमें आने लगते हैं इसलिए इसे Religious Ocd भी कहते हैं।

5- परेशान करने वाले विचार आना- इसमें व्‍यक्ति को कुछ विचार जो उसकी चिंता को बढ़ाते हैं बार-बार आने लगते हैं उनसे निजात पाने के लिए वह मन ही मन उसे बचने का प्रयास करता है। इसे Rumination OCD कहते हैं और बार-बार किसी एक ही बात के बारे में सोचना या एक ही प्रकार से सोचना इसका लक्षण है।

6- चीजों को व्‍यवस्थि‍त करते रहना- इसमें वस्‍तुओं को एक क्रम में या ऑर्डर में रखने की आदत होती है। जैसे घर में रखी हुई चीजों को हर बार एक विशेष क्रम में रखना। किसी दूसरे व्‍यक्ति के घर जाकर भी कौन सी चीजें व्‍य‍वस्थित नहीं हैें इस पर बार-बार ध्‍यान जाना और उनको व्‍य‍वस्थि‍त करने की कोशिश करना।

7- चीजों को इकट्ठा करना- इसमें व्‍यक्ति को लगता है कि कोई वस्‍तु उससे खो ना जाए या ऐसी वस्‍तु शायद आने वाले समय में ना मिले तो इसमें वह इस प्रकार की वस्‍तुओं को इकट्ठा करना शुरू कर देता है जिनमें से ज्‍यादातर उसके काम की नहीं होतीं या जो आसानी से मिल सकती हैं। फिर भी वह उन चीजों को इकट्ठा करता है।

8- एक ही बात कई बार पूछना- इसमें पीडि़त को ऐसा लगता है कि कहीं उससे कोई गलती ना हो जाए जिसके कारण वह लगातार चिंतित रहता है और अक्‍सर वह अपने द्वारा किये गये कार्यों के बारे में लोगों से पूछता रहता है ताकि वह आश्‍वस्‍त हो सके कि उससे कहीं कोई गलती तो नहीं हुई।

परीक्षा परिणाम के दौर में पेरेंट्स के लिए जरूरी टिप्‍स

Parenting tips to guide children for bright future and facing failures (Hindi)

अभी एक न्‍यूज पढ़ने को मिली कि एक दसवीं क्‍लास के बच्‍चे की मां ने सोशल मीडिया पर शेयर किया कि वे अपने बच्‍चे की बोर्ड परीक्षा में 60% लाने पर खुश हैं।

जहां आजकल इस तरह की खबरों से अखबार भरे पड़े हैं कि किसके किस विषय में  100 में से 100 अंक आए, या किसने कितने घंटों रोज पढ़ाई की। वहां इस तरह की खबर सुनकर अच्‍छा लगा कि इस तरह के भी पेरेंट्स हैं जो बच्‍चों की क्षमता को स्‍वीकार कर रहे हैं, उसे सेलिब्रेट कर रहे हैं।

आजकल Exam में पास या फेल होना कोई मुद्दा नहीं रह गया है। मुद्दा है तो ये कि कौन 90 प्रतिशत की बाउंड्रीलाइन से पीछे है और कौन उससे आगे। सफलता के लिए मापदंड समय के साथ में इतने बदल गए हैं कि ज्‍यादातर लोग उस सीमारेखा को ना छू पाने को ही असफलता मान लेते हैं। 

अगर हम उम्‍मीद करें कि इस नंबर गेम वाली शिक्षा व्‍यवस्‍था में कोई बदलाव आएगा तो ऐसा फिलहाल तो होता नजर नहीं आ रहा। तब तक ना जाने कितने छात्र निराशा, हताशा, हीनभावना से दबकर अपनी संभावनाओं को, जीवन तक को मिट्टी में मिला चुके होंगे।


ऐसे में अगर हम पेरेंट्स हैं या हमारे घर में बच्‍चे हैं तो हमें क्‍या करना है हमें इस बारे में सोचना है। सिस्‍टम, अवसरों की कमी, कंपटीशन या बच्‍चाें को दोष देना समस्‍या को बढ़ावा देना है। केवल हमें ही जिम्‍मेदारी उठानी है ऐसा सोचकर ही हम बच्‍चों को समर्थ बना सकेंगे।

वैसे तो इस विषय पर बहुत लंबी बात की जा सकती है पर संक्षेप में कुछ बिंदुओं पर चर्चा की जाना जरूरी है -

1- पढ़ाई के बारे में हर वक्‍त चर्चा सही नहीं- कुछ लोग जब भी बच्‍चों से बात करेंगे तो उनकी पढ़ाई से ही संबंधित बातें करेंगे। दूसरों का उदाहरण देंगे और दूसरों से जब भी बातें करेंगे तो बताएंगे कि उनका बच्‍चा तो पढ़ने पे ही पूरा ध्‍यान लगाता है। ऐसे में बच्‍चे पर दबाव रहता है कि उसकी हर गतिविधि Results Oriented होनी चाहिए। लाइफ में पढ़ाई ही सब कुछ नहीं है ये बात Students से ज्‍यादा Parents को समझनी होगी। ज्‍यादातर माता-पिता की हमारे परंपरागत भारतीय समाज में यही सोच रहती है कि पढ़-लिख लोगे तो कुछ बन जाओगे। पढ़ाई बेशक जरूरी है भले औसत दर्जे की हो पर आज केवल पढ़ लेने भर से कोई कुछ बन जाएगा इसकी गारंटी नहीं। देश के हर शहर और गांव में अनगिनत डिग्रीधारी घूम रहे हैं। 

2- कुछ बन जाओ तब  ये सब करना-स्‍कूल या कॉलेज में पढ़ने वाले बच्‍चों से अक्‍सर ये कहा जाता है। Students पर वैसे भी काफी दबाव होता है- पढ़ाई का, पेरेंट्स का और आसपास के वातावरण का भी जहां दूसरों से हमेशा उसकी तुलना होती है। ऐसे में इस तरह की बातें उन परऔर दबाव बनाती हैं। बेशक Career बहुत जरूरी है पर जीवन को जीना भी कम महत्‍वपूर्ण नहीं। वर्तमान में होने वाली आनंदपूर्ण गतिविधियों से बच्‍चों को दूर रखना भी उनके विकास के लिए एक बाधा साबित हो जाता है।

3- बच्‍चों को फाइनेंस के बारे में  शिक्षित नहीं करना- बहुत से पेरेंट्स ऐसा भी व्‍यवहार करते हैं कि बच्‍चों को छोटे-माेटे कामों से भी दूर रखते हैं। तुम बस पढ़ाई करो बाकी सब हम कर लेंगे। ऐसे में बच्‍चे छोट-छोटे काम भी नहीं सीख पाते। पैसा कैसे खर्च करना है, कैसे बचाना है, पैसा कहां निवेश किया जाता है इसके बारे में वे बिलकुल नहीं जानते। उनकी सारी जरूरतें पूरा करने का रेडीमेड सिस्‍टम बना हुआ होता है घर में। ऐसे में पैसा बनाने और उसे संभालने लायक होने की उम्र में उन्‍हें बहुत दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है। बड़े बिजनिस लीडर्स ने भी छोटी उम्र में बहुत छोटे बिजनेस किये हैं जिनसे उन्‍होंने पैसे का गणित समझा।

4- मार्कशीट में अंकों से ज्‍यादा जरूरी हैं दूसरी चीजें- हमें अपने बच्चों को ये समझाना चाहिए और खुद भी ये समझना चाहिए कि किसी भी करियर में सफलता के लिए जरूरी चीजें हैं - आत्मविश्वास, लगातार मेहनत और संवाद की कला (communication skills).  किसी विषय के बारे में केवल पढ़ाई करने भर से सफलता का कोई संबंध नहीं। जब तक आपके काम की कोई Value नहीं तब तक आपके दिमाग में भरे ज्ञान का कोई मतलब नहीं। आपका काम आपको सफलता तभी दिलाएगा जब वो किसी के लिए उपयोगी हो। हम कितनी ही Knowledge इकट्ठा कर लें या कितने ही अच्‍छे Marks लेकर आयें पर किसी काम को करने की योग्‍यता का इससे ज्‍यादा लेना देना नहीं। पढ़ाई और काम करना ये दोनों काफी अलग हैं आपस में। 

5- निर्णय लेना व समस्‍याओं का सामना करने की क्षमता विकसित करना- ये इतने महत्‍वपूर्ण गुण हैं जो यदि बच्‍चे सीख पाएं तो जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए उन्‍हें डिग्री या सर्टिफिकेट का मोहताज नहीं होना पड़ेगा। इसके लिए हम पैरेंट्स को थोड़ा हिम्‍मत और धैर्य से काम लेना होगा और बच्‍चों को थोड़ी स्‍वतंत्रता देनी होगी। केवल किताबें रटने और अच्‍छे मार्क्‍स लाने भर से ना तो उनमें निर्णय लेने की क्षमता ( Decision Making ) आएगी और ना ही वे असफलता और मुश्किलों का सामना करने को तैयार रहेंगे। हमें खुद भी समझना होगा कि कोई भी असफलता अंतिम नहीं होती और कोई भी विकल्‍प अंतिम नहीं होता। यदि बच्‍चा किसी क्षेत्र में असफल होता है तो उसे समझाना चाहिए कि दुनिया में अनगिनत विकल्‍प हमेशा मौजूद हैं और बार बार भी फेल होते हैं तो वह भी बेकार नहीं जाता, अनुभव देकर ही जाता है और आजकल तो बहुत सारे लोग अपने अनुभव बांटकर ही पैसा कमा रहे हैं।


डिप्रेशन के बारे में कुछ गलत धारणाएं

डिप्रेशन से आज के समय में बहुत लोग प्रभावित हैं पर इसके बारे जानकारी बहुत ही कम है। कम जानकारी का होने से ही इसके बारे में लोगों में बहुत सी भ्रांतियां हैं। इसी कारण से इसको कई बार लोग हल्‍के में लेते हैं या मनमाफिक सलाह देने लगते हैं।

आजकल इस शब्‍द का प्रयोग भी इसी कारण ज्‍यादा होता हैं क्‍योंकि लोग जानते ही नहीं कि डिप्रेशन क्‍या है? अक्‍सर लोग कहते हुए मिलेंगे कि आज मैं बहुत डिप्रेश्‍ड हूं या कोई व्‍यक्ति किसी भी कारण से उदास है तो लोग कहेंगे कि वो अभी थोड़ा  Depressed है।

असल में Depression या अवसाद में  'थोड़ा' शब्‍द जोड़ना भी एक समस्‍या है जिसके कारण लोग इसे छोटी-मोटी समस्‍या मानते हैं और ज्‍यादा ध्‍यान नहीं देते। जबकि आज ये महामारी की तरह बढ़ रही है। किसी भी बीमारी के बारे में सही और जरूरी जानकारी का होना उसके उपचार में सहायक होता है। बीमारी के बारे में जानकारी के अभाव में मरीज समस्‍या तो बढ़ ही रही होती है, उसके परिवार या आसपास के लोग भी उसकी सहायता के बारे में जरूरी कदम नहीं उठा पाते।



आज हम कुछ ऐसे बिंदुओं पर बात करेंगे जिनके बारे में  स्‍पष्‍ट जानकारी होना बहुत जरूरी है उनके लिए जो खुद इस बीमारी से जूझ रहे हैं या उनसे जुड़ा कोई व्‍यक्ति इससे पीडि़त है।

डिप्रेशन कोई बड़ी बीमारी नहीं है- यह एक आम धारणा है इसके बारे में। इसका एक कारण ये भी है कि जो पीडि़त व्‍यक्ति है वह भी इसके बारे में किसी से ज्‍यादा चर्चा नहीं करता। उसके व्‍यवहार में परिवर्तन अवश्‍य होता है पर वह क्‍या महसूस कर रहा है इसकी चर्चा बहुत कम होती है। उसे लगता है कि लोग क्‍या कहेंगे अगर वह अपनी परेशानी शेयर करता है और डिप्रेशन के केसेज में मरीज असहाय ( Helpless ) महसूस करता है इसलिए उसकी परेशानी उसके अलावा कोई ऐसा व्‍यक्ति नहीं समझ पाता जो डिप्रेशन के बारे में ना जानता हो। इसलिए जिन्‍होंने इस समस्‍या का सामना ना किया हो उनकी ये राय बन जाती है कि ये एक गंभीर बीमारी नहीं है। जबकि अवसाद से ग्रस्‍त व्‍यक्ति आत्‍महत्‍या तक कर लेता है इसलिए इसे गंभीरता से लेना और उपचार शुरू करना बहुत जरूरी है वरना स्थिति भयावह हो सकती है।

डिप्रेशन पॉजिटिव सोचने से सही हो सकता है- कई बार डिप्रेशन से प्रभावित व्‍यक्ति खुद भी ऐसा ही सोचता है पर ऐसा करना उसकी मदद नहीं कर पाता। डिप्रेशन के बारे में ऐसा सोचना या किसी से ऐसा कहना उसकी समस्‍या को अक्‍सर बढ़ा ही रहा होता है। चूंकि यह एक बीमारी है और कोई छोटी-मोटी बीमारी नहीं है तो इसका निदान भी इसे बीमारी समझकर ही करना चाहिए। जब तक हम सही कदम नहीं उठाते इसे ठीक करने के लिए तब तक इस तरह की बातों से हमें कोई मदद नहीं मिल सकती।

डिप्रेशन कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाता है- ज्‍यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता है और ऐसा सोचकर हम एक ऐसे व्‍यक्ति जिसको सहायता की और इलाज की जरूरत है उसकी मदद करने की बजाय उसे उसके हाल पर छोड़ देते हैं। इसे भी हमें अन्‍य बीमारियों की तरह ही लेना चाहिए, शारीरिक बीमारियों और मानसिक बीमारी के उपचार के तरीके कुछ अलग हो सकते हैं जैसे शारीरिक बीमारी में दवाईयां ज्‍यादा सहायता करती हैं जबकि इसमें मानसोपचार ( Pychotherapy ) या काउंसलिंग ( Psychological Counselling ) बहुत मदद करती है।

उदासी, दुख आदि डिप्रेशन ही हैं- उदास होना, दुखी होना,मन ना लगना इस तरह की भावनाएं हर किसी के जीवन में आती हैं पर डिप्रेशन इससे कहीं बढ़कर है। डिप्रेशन के कुछ लक्षणों में से यह भी हैं पर जब ये भावनाएं लंबे समय तक बनी रहें और व्‍यक्ति की दिनचर्या, सामान्‍य कार्यकलाप व व्‍यवहार में परिवर्तन दिखाई दे तब ये डिप्रेशन का रूप ले लेता है। व्‍यक्ति इनसे बाहर ना निकल पाये या बाहर निकलने में असमर्थ हो तब वह अवस्‍था अवसाद बन जाती है।

डिप्रेशन दवाओं  से ठीक हो जाता है- डिप्रेशन में दवाईयों की भूमिका सीमित होती है और एक अच्‍छे साइकोलॉजिस्‍ट या मनोवैज्ञानिक काउसंलर के मार्गदर्शन में ली जाने वाली थैरेपी बहुत असरकारक होती हैं। बहुत से मामलों में केवल काउंसिलिंग या साइकोथैरेपी से ही रोगी को डिप्रेशन से छुटकारा मिल जाता है। कुछ गंभीर मामलों में दवाईयां और साइको थैरेपी दोनों की जरूरत होती है।

जब हो तनाव तो ये फॉर्मूला देगा तुरंत राहत

तनाव छोटा हो या बड़ा, हमारी सोच से वह बहुत हद तक संबंध रखता है। हमारा मन इस तरह से व्‍यवहार करता है कि जब वह परेशान होता है तो बहुत छोटी बातों में भी उलझकर रह जाता है और कभी-कभी बड़ी बातें भी इसे प्रभावित नहीं करतीं।

हम कहीं भी हों, किसी भी स्थिति में हों हमारे साथ एक बढि़या बात है कि हम अपनी कल्‍पना के घोड़े कहीं भी दौड़ा सकते हैं। हम शारीरिक रूप से भले एक जगह से दूसरी जगह ना जाएं पर हमारा मन कभी भी किसी भी यात्रा पर निकल पड़ता है। हम साइंस फिक्‍शन फिल्‍म देखते हैं तो हकीकत से कटकर उसमें कुछ समय के लिए खो जाते हैं। किसी नये अविष्‍कार या भविष्‍य में आने वाली किसी नयी तकनीक के बारे में पढ़ते हैं तो कल्‍पना करने लग जाते हैं कि भविष्‍य में ऐसा होगा, वैसा होगा जबकि अभी वर्तमान में हमने उसे देखा भी नहीं है।

बस मन की वर्तमान को छोड़कर बहुत आगे या बहुत पीछे भागने की आदत का ही हमें इस्‍तेमाल करना है।



लोग अक्‍सर जीवन में चल रही बातों से इतने तनाव में आ जाते हैं कि उनके दिमाग में एक ही प्रश्‍न चलता रहता है कि आगे क्‍या होगा। बस यहीं हमें रुकना हैं और ये देखना शुरू करना है कि अब तक क्‍या हुआ है।

हम थोड़ा खुद को इतिहास में ले जाएं, अपने परिवार के बड़ों और उनके पूर्वजों के जीवन की कठिनाईयों के बारे में सोचना शुरू कर दें तो पाएंगे कि हमारी अभी की समस्‍याएं इतनी गंभीर नहीं हैं कि उनके कारण तनाव पाला जाए।

पिछले सौ सालों,पांच सौ साल या हजारों साल में जो कुछ हुआ है और जिन परिस्थितियों का लोगों ने सामना किया है उनके बारे में पढ़ना शुरू करें।

स्‍ट्रेस मैनेजमेंट के एक सेमिनार में एक बुजुर्ग वक्‍ता देश की वर्तमान समस्‍याओं पर बात कर रहे थे। उनका कहना था कि लोग कहते हैं इतनी सारी समस्‍याएं हैं देश के सामने तो भविष्‍य में क्‍या होगा। उन्‍होंने बताना शुरू किया कि जब वे छोटे थे तो उनके समय के लोग भी यही चिंताएं करते थे पर उनकी चिंता भोजन के विषय में थी। हमारा देश उतना भोजन पैदा नहीं कर पाता था जितना कि जरूरत थी। तब विदेशों से अनाज आता था, राशन के माध्‍यम से लोगों तक पहुंचता था। पर भविष्‍य में वह एक समस्‍या नहीं रही हम आत्‍मनिर्भर हो गए। सड़कें नहीं थीं, वाहन नहीं थे, जरूरी सूचनाएं भी लोगों तक बहुत समय में पहुंच पाती थीं।

आज एक आम व्‍यक्ति भी इतना सुविधापूर्ण जीवन जी रहा है जितना पुराने समय में राजाओं तक को उपलब्‍ध नहीं था। आज हम शिकायत कर सकते हैं कि कानून ठीक से काम नहीं कर रहा, सरकार ठीक से काम नहीं कर रही। पर इतिहास में लोगों को ऐसे हमलों और युद्धों का सामना करना पड़ता था कि उनका सब कुछ भी लुट जाए तो भी वे कुछ कर नहीं सकते थे।

आज लोग दूसरे शहरों, स्‍थानों में जाकर रहने लगते हैं अच्‍छे अवसरों की तलाश में अपनी मर्जी से। पुराने समय में हजारों-लाखों लोगों को ना चाहते हुए भी अपने जमे-जमाये व्‍यवसायों, कारोबारों, घरों को छोड़ना पड़ जाता था विपरीत परिस्थितियों के कारण।

इतिहास में कितने व्‍यापक नरसंहार, लूटपाट, तबाहियां हुई हैं।आज हम शायद पहले की तुलना में तो बहुत सुरक्षित स्थितियों में रह रहे हैं।

अकाल की स्थिति में ही ना जाने कितने लोग भूख से मारे जाते थे। बड़े पैमाने पर फैलने वाली बीमारियों से लड़ने में लोग सक्षम नहीं थे। बेशक ये समस्‍याएं आज भी हैं पर बहुत छोटे स्‍तर पर। जरा सी बात मीडिया में और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहुंचने में समय नहीं लगता और सरकारों को भी तुरंत कार्यवाही करनी पड़ती है।

किसी एक व्‍यक्ति की परेशानी भी आज अंतर्राष्‍ट्रीय सुर्खियों में आ जाती है। विदेश में फंसा कोई नागरिक अपने फोन पर ही सोशल मीडिया के माध्‍यम से सरकार तक अपनी बात पहुंचा पा रहा है। हमारी परेशानियों को सुलझाने के लिए तमाम तरह के उपकरण, माध्‍यम, मंच आज उपलब्‍ध हैं। कहा जाता है कि हर किसी को अपनी मदद खुद करनी पड़ती है और आज के समय में अच्‍छी बात ये है कि खुद की मदद करने के लिए भी इतने साधन आज उपलब्‍ध हैं जितने पहले कभी नहीं थे। हम अपनी किसी भी परेशानी के बारे में इंटरनेट से मदद ले सकते हैं, जानकारी ले सकते हैं और संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों से संपर्क कर सकते हैं, दूसरों के अनुभव पढ़, सुन, देख सकते हैं। क्‍या वाकई गुजरे समय और इतिहास की तुलना में एक बहुत अच्‍छे समय में हम नहीं जी रहे हैं ?

तो जब भी आप परेशानी में हों तो अपनी टेंशन को दूर करने के लिए इस फार्मूले को जरूर आजमाईये। इतिहास की यात्रा पर चले  जाईये। तनाव से बचने का ये उपाय आपके लिए बहुत मददगार साबित होने वाला है।

मन को स्‍वस्‍थ और संतुलित रखने की दो चाबियां

जब भी हम किसी कठिनाई या संकट में होते हैं तो उससे निकलने के रास्‍ते भी ढूंढ़ते हैं। आज के इंटरनेट के युग में किसी भी विषय के बारे में खोजना जितना आसान हो गया है उतना पहले कभी नहीं था। आज हर तरह की सूचना और सलाह हमारे लिए उपलब्‍ध है पर सभी विकल्‍पों में से हम किसे चुनें ये भी अपने आप में एक समस्‍या है।

अक्‍सर समस्‍या ये नहीं होती कि उसका समाधान नहीं मिल रहा है बल्कि हम स्‍वयं ही निर्णय नहीं कर पाते कि सामने दिख रहे रास्‍तों में से कौन सा रास्‍ता चुनें।



और सबसे मजेदार बात ये है कि हम छोटी-छोटी बातों के लिए किसी बड़े उपाय की खोज में लग जाते हैं। अगर हम छोटी-छोटी बातों के लिए छोटे उपायों को ही पकड़ लें तो ज्‍यादातर समस्‍याओं का तुरत-फुरत समाधान हम स्‍वयं ही निकाल लेंगे।

जिस प्रकार हर ताले की चाबी होती है। उसी तरह जीवन की कठिनाईयों और तनाव से निपटने के लिए भी चाबियां हैं हम सबके पास और एक बड़ी खूबसूरत बात इनके साथ ये है कि इन चाबियों से  हम बहुत से ताले खोल सकते हैं। एक तरह से हम इन्‍हें मास्‍टर चाबी भी कह सकते हैं। इनमें से केवल दो चाभियां इतनी महत्‍वपूर्ण हैं कि हमारा ज्‍यादातर काम इनसे ही चल सकता है।

 जिन दो बातों या सूत्रों की मैं यहां बात करूंगा, वे काफी हद तक हमें मदद करेंगे जीवन में। इसके साथ ही हमें ये बात भी ध्‍यान में रखनी है कि ये इन बातों के प्रति हमें जागरूक होना होगा और लगातार इन बातों का ध्‍यान रखने से ये हमारे व्‍यक्तित्‍व का हिस्‍सा बन जाएंगी समय के साथ।

1- हममें से अधिकतर लोग शिकायतों से भरे हुए हैं चाहे वह जीवन के किसी भी पहलू से संबंध रखती हो। जिस वातावरण में हम रहते हैं यदि यहां ऐसे लोग ज्‍यादा हैं तो समस्‍या बढ़ जाती है क्‍योंकि जाने-अनजाने हम भी वैसे ही बन जाते हैं। पर इस चक्रव्‍यूह से निकलने की जिम्‍मेदारी भी हमें ही लेनी है। क्‍या आप सारी जिंदगी मजे से जीने की बजाय उसको शिकायतें करते रहने में बर्बाद करना चाहेंगे ? प्रश्‍न ये है कि जीवन में हम इतनी शिकायतें क्‍यों करते हैं। कारण बहुत सीधा सा है पर फिर भी हमें नजर नहीं आता। हमारे पास जो कुछ है उसका हमारे लिए कोई मूल्‍य नहीं। बस हम भागे जा रहे हैं उस सबके पीछे जो हमारे पास नहीं। और वो भी मिल जाए तो उसका भी मजा खतम। कभी इस नजरिये से भी सोचें कि बहुत कुछ हमारे पास ऐसा है जिसे हम कितना भी प्रयास करके या कितने भी पैसे खर्च करके नहीं पा सकते।

ऑक्‍सीजन जिसके कारण हम जिंदा हैं वो हमें मुफ्त में मिल रही है और उसे फेंफड़ो में भरने के लिए हमारी सांसे भी बिना कुछ  किये चल रही हैं। हमें लगता है कि हमारा जीवन हम चला रहे हैं हां कुछ हद तक ये सही है पर हमारे जीवन की ज्‍यादातर व्‍यवस्‍थाएं प्रकृति के सहारे ही चल रही हैं। हमें लगता है हम फसल उगाते हैं पर यदि धरती बीज उगाना बंद कर दे तो हम कुछ भी नहीं कर पायेंगे। दुनिया में बहुत से लोगों को भोजन तो छोडि़ए पीने के पानी का इंतजाम करने के लिए ही कई किलोमीटर चलना पड़ता है। हमारे पास जितना कुछ है हम उसका आनंद उठाने की बजाय और ज्‍यादा इकट्ठा करने की दौड़ में व्‍यस्‍त हैं। हम लोगों के प्रति शिकायत भाव रखते हैं पर सोचिए जिनके प्रति हमें शिकायत है उन्‍होंने भी कभी ना कभी हमारे लिए कुछ अच्‍छा किया ही होगा। दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो नितांत अकेले है, उनके लिए रिश्‍ते जैसे शब्‍द हैं ही नहीं।

कभी सोचें कि जो कुछ है हमारे पास कभी उसके प्रति हमने धन्‍यवाद का भाव प्रकट किया है। यदि नहीं तो अच्‍छी बात है कि अभी से इसे शुरू कर सकते हैं। जीवन को आनंदित करने की ये एक बहुत अच्‍छी युक्ति है। आप भले धार्मिक हों या नास्तिक, अमीर हों या गरीब रोज सुबह उठकर सबसे पहले उन बातों का शुक्रिया अदा करें इस ब्रह्मांड को जो आपके पास हैं। आपका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलने लगेगा।

2- जब परिस्थितियां हमारे मुताबिक होती हैं तब हमें लगता है सब ऐसा ही चलता रहेगा। पर जब चीजें हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं तो हम उसे झेल नहीं पाते। हम या तो उससे लड़ने की कोशिश करते हैं या तनाव और दुख से खुद को बर्बाद कर रहे होते हैं। पर असल में जीवन एक सीधी रेखा की तरह नहीं चलता है। जब चीजें अच्‍छी होती हैं तो हमारी कोशिश यही रहती है कि बस सब ऐसे ही चलता रहे। सफलता के बारे में भी कहा जाता है कि सफलता पाना आसान है पर उसे कायम रखना मुश्किल। मुश्किल ही क्‍या असंभव सा ही है। हां कुछ समय अंतराल के लिए कायम रखा जा सकता है उसे। पर हम जब स्‍वीकार कर लेंगे कि शिखर के बाद ढलान शुरू होती ही है तो हम उस ढलान पर चलकर ही नये शिखरों पर पहुंचने के रास्‍ते भी खोज लेंगे।

जीवन ताश के पत्‍तों के खेल के जैसा है। हम इस खेल में ये नहीं कह सकते कि हमें सही पत्‍ते नहीं मिले, हमें हमारे मन मुताबिक पत्‍ते मिलेंगे तभी हम खेलेंगे। हमें जो मिला है उसे स्‍वीकार करके ही हमें खेलना है।

जीवन हमारे मुताबिक नहीं चलता है पर हां हमें स्‍वतंत्रता है चुनाव की कि हम किस रास्‍ते चलें, कैसे चलें। बहुत सी चीजें जो हमें मिली हैं उन्‍हें हम बदल नहीं सकते। पर उनसे उलझने या टकराव का रास्‍ता चुनने से हम कहीं पहुंचेंगे नहीं। इस बात पर हमारा ध्‍यान केंद्रित रहना चाहिए कि हमें कहां पहुंचना है। बाकी बातें जैसी की तैसी बनी रहेंगी इस बात को यदि हम स्‍वीकार कर लेंगे तो हमारे आगे बढ़ते रहने की संभावनाएं जिंदा रहेंगी।

निस्‍संदेह जो समस्‍याएं हैं हमारे सामने उनका हल खोजना ही है हमें। पर उनके अलावे भी बहुत कुछ ऐसा है जिसका हल खोजने में हमें अपनी ऊर्जा और समय व्‍यर्थ नहीं करना चाहिए। यदि हम उन्‍हें सुलझा भी लें तो भी हमें कुछ मिलना नहीं है। बस उन्‍हें स्‍वीकार कर लें और उसी हाल में छोड़ दें। जब हम आगे बढ़ेंगे तो ये बातें भी पीछे छूट जायेंगी।

अंधेरे में रोशनी दिखाते स्‍वामी विवेकानंद के अनमोल विचार

मित्रों स्‍वामी विवेकानंद एक ऐसे प्रकाश स्‍तंभ की तरह हैं जिनका जीवन और विचार उन्‍नीसवीं सदी से लेकर आज इक्‍कीसवीं सदी में भी हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। अक्‍सर जब मन में कुछ निराशा आती है और कुछ भी समझ में नहीं आता ऐसे समय में स्‍वामी विवेकानंद के विचारों को पढ़कर मन में फिर से एक आशा जगती है और हिम्‍मत फिर जुटा पाने लायक स्थिति में हम आ पाते हैं।




हममें से हरेक का जीवन उतार चढ़ावों से भरा है एवं सकारात्‍मता और नकारात्‍मकता दोनों ही प्रकार की भावनाएं हमारे मन में आती जाती रहती हैं। कभी हम उत्‍साह और ऊर्जा से भरे हुए होते हैं और कभी हम थके हुए, टूटे हुए, निराशा में डूबे हुए होते हैं। जिस तरह प्रकाश की हमें जरूरत होती है अंधकार से निकलने के लिए वैसे ही मन के अंधेरों को प्रकाशित करने वाले विचार भी हमारे लिए जरूरी हैं। कोई ना कोई एक ऊर्जा का स्रोत होना चाहिए जहां से, घर में आने वाली बिजली की लाइन की तरह, प्रकाश की व्‍यवस्‍था हमारे मन-मस्तिष्‍क को लगातार मिलती रहे। स्‍वामीजी को एक ऐसे ही ऊर्जा-स्रोत और प्रेरणा पुंज की तरह मैं देखता हूं।

समय-समय पर इन सुविचारों को पढ़ना हमारा हौसला और जीवटता बनाये रखता है -


1- अपने स्‍नायु शक्तिशाली बनाओ। हम लोहे की मांसपेशियां और फौलाद के स्‍नायु चाहते हैं। हम बहुत रो चुके, अब और ना रोओ। अपने पैरों पर खड़े हो और मनुष्‍य बनो।


2- विश्‍व में बहुत से लोग इसलिए असफल हो जाते हैं क्‍योंकि उनमें समय पर साहस का संचार नहीं हो पाता।


3- जो तुम सोचते हो वो हो जाओगे। यदि तुम खुद को कमजोर समझते हो, तुम कमजोर हो जाओगे। अगर तुम खुद को ताकतवर समझते हो तो ताकतवर हो जाओगे।


4- स्‍वयं को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।


5- किसी चीज से डरो मत। तुम अदभुत काम करोगे। यह निर्भयता ही है जो क्षण भर में परम आनंद लाती है।


6- जो कुछ भी तुम्‍हें कमजोर बनाता है- शारीरिक,बौद्धिक या मानसिक उसे जहर की तरह त्‍याग दो।


7- किसी दिन जब आपके सामने कोई समस्‍या ना आये,आप सुनिश्चित सकते हैं कि आप गलत रास्‍ते पर चल रहे हैं। 


8- एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी आत्‍मा उसमें डाल दो और बाकी सब भूल जाओ।


9- ब्रह्मांड की समस्‍त शक्तियां पहले से हमारे पास हैं। ये हम ही हैं जो अपनी आंखों को बंद कर अंधेरे का रोना रोते हैं।


10- उठो मेरे शेरों, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो। तुम एक अमर आत्‍मा हो, स्‍वच्‍छंद जीव हो, धन्‍य हो, सनातन हो। तुम तत्‍व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्‍व तुम्‍हारा सेवक है तुम तत्‍व के सेवक नहीं।

डिप्रेशन को बढ़ाने वाली इन आदतो को कहें बाय बाय

कई बार हमारी बहुत सी छोटी छोटी आदतें हमारी निगेटिव थिंकिंग या डिप्रेशन को और बढ़ा रही होती हैं। एक तरफ तो हम इससे बाहर निकलने की कोशिश कर रहे होते हैं। दूसरी तरफ कुछ बातें हमारी समस्‍या को और बढ़ा रही होती हैं। जरूरी नहीं कि हम जानबूझ कर ही इन आदतों को नहीं छोड़ना चाहते बल्कि होता ये है कि हमें अक्‍सर पता ही नहीं होता कि ये बातें भी हमारी परेशानी के लिए खाद-पानी का काम कर रही हैं।

ये बातें हैं तो बहुत छोटी पर इन पर थोड़ा सा ध्‍यान देने से ही आपकी समस्‍या काफी हद तक कंट्रोल में आ सकती है।



दोस्‍तों, हमें शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरीकों से स्‍वस्‍थ रखने में हमारी Daily Habits का बड़ा हाथ होता है। हमारी बहुत सी रोज की आदतों में कुछ ऐसी बातें शामिल होती हैं जो हमारी समस्‍या का कारण भी हो सकती हैं और उनको बढ़ाने का काम तो करती ही हैं। यहां हम किसी नयी आदत को शामिल करने के बारे में बात नहीं करेंगे। हम यहां चर्चा करेंगे कि कौन सी बातें हैं जिन्‍हें हमें या तो छोड़ना चाहिए या फिर उनकी तरफ ध्‍यान देना बंद कर देना चाहिए।

चलिए आज से ही इन आदतों को बाय-बाय कर देते हैं-

1- सबसे पहले हम ध्‍यान देंगे कि हमारे दिन की शुरुआत करने का क्‍या तरीका है। ज्‍यादातर लोग सुबह उठकर चाय-कॉफी से अपना दिन शुरू करते हैं। चाय-कॉफी आप ले सकते हैं पर इसमें थोड़ा सा बदलाव करें। सुबह उठकर सबसे पहले दो या तीन गिलास पानी पियें। ये आपके शरीर को ऊर्जा देगा और रात के लंबे अंतराल के बाद हाइड्रेट करेगा। चाय या काॅफी इसके कम से कम आधा घंटे बाद लें।

2- दूसरी बात भी सुबह की हमारी आदत से जुड़ी है- समाचार-पत्र पढ़ना। ये एक बहुत खतरनाक आदत है खासकर ऐसे व्‍यक्ति के लिए जिसका दिमाग पहले से ही नकारात्‍मक विचारों से भरा हुआ है। साथ ही दिनभर भी बेवजह और व्‍यर्थ की खबरों को सुनने, देखने और पढ़ने से बचें। केवल जरूरी  खबरें पढ़ें वो भी अपने जरूरी काम निपटाने के बाद।

4- ज्‍यादातर समय घर में ही गुजारना या अकेले रहने की आदत। डिप्रेशन के शिकार लोगों में अकेलेपन की भी आदत हो जाती है। डिप्रेशन हमारी ऊर्जा को बहुत कम कर देता है इसलिए भी हमारा मन कहीं जाने का नहीं होता। फिर धीर-धीरे यह आदत सी बन जाती है। बहुत ज्‍यादा नहीं पर कोशिश करें जितना हो सके खाली वक्‍त में घर के बाहर निकलें और लोगों से मिलें। कम से कम घर से लगी सड़क पर ही टहलना शुरू करें।

5- सूर्य की रोशनी से दूर रहना। सूरज की खुली धूप हमारे अंदर सकारात्‍मकता और ऊर्जा लाती है। कम रो‍शनी में या लंबे समय तक प्राकृतिक रोशनी से दूर रहने वाले लोगों में डिप्रेशन के लक्षण जल्‍दी आने लगते हैं। विटामिन डी की कमी निराशावादी विचारों को बढ़ाती है।

6- सुबह उठते ही फोन हाथ में  लेने की आदत और हर समय फोन चैक करने आदत। फोन में आने वाले नोटिफिकेशन आते ही चैक करते समय हम भूल जाते हैं कि उन्‍हें तुरंत ही ना देखने से हमारा कोई काम बिगड़ नहीं जाएगा जब तक वे हमारे व्‍यवसाय या काम से संबंधित ना हों। डिजिटल युग में आगे रहने का मतलब ये नहीं कि जिन बातों से हमारा कुछ बनना-बिगड़ना नहीं उन्‍हें बेवजह समय दिया  जाए।

7- सोशल मीडिया एक बहुत ही अच्‍छा टूल है लोगों से जुड़ने और उन तक अपनी बात पहुंचाने का। पर इसका बेवजह या यूं ही उपयोग करते रहने से केवल टाइम वेस्‍ट ही नहीं होता है बल्कि उससे भी बढ़कर ये हमें कई तरीकों से प्रभावित करता है। हम बेवजह दूसरों की लाइफ और लाइफस्‍टाइल पर इतना ध्‍यान देने लग जाते हैं और हमें लगता है कि दूसरों की जिंदगी में सब अच्‍छा चल रहा है और फिर हम अपने वर्तमान के प्रति शिकायतों से भर जाते हैं। ये एक प्रकार का एडिक्‍शन भी है और यदि हमारी जिंदगी में सब कुछ ठीक नहीं है या हम उतने सफल नहीं हैं तो दूसरों से तुलना कर अनजाने में ही हम अपनी निराशा को बढ़ाते हैं।

8- रात को सोने से पहले फोन,टीवी या कंप्‍यूटर में आंखें गड़ाये रखने कीआदत। रात होने पर हमारे दिमाग में मेलाटोनिन हार्मोन सक्रिय हो जाता है जो हमारी अच्‍छी नींद के लिए जरूरी है पर आज के डिजिटल युग की हमारी आदतों से अच्‍छी नींद के लिए जरूरी हारमोन का स्रावित होना प्रभावित होता है। हमारे शरीर और मन को आराम देने की सबसे बड़ी रिलैक्‍शेसन तकनीक है अच्‍छी नींद। अगर हम नींद अच्छी लेंगे तो ना तो हमें मन को शांति देने वाली तकनीकों, तरकीबों और थैरेपीज की खोज करनी होगी और हम बहुत हद तक अवसाद जैसी समस्‍याओं पर भी नियंत्रण कर सकेंगे। मनुष्‍य के अलावा किसी भी अन्‍य प्राणी को मन को शांत रखने के लिए और अच्‍छी नींद के लिए ना किसी से सलाह लेने की जरूरत पड़ती है ना ही किसी तकनीक को आजमाने की। ये अपने आप ही हो जाता है क्‍योंकि सभी जीव अपनी बॉडी-क्‍लॉक के अनुरूप दिनचर्या पर ही चलते हैं। जबकि हम अपनी जैविक घड़ी या Body Clock के विपरीत आदतें अपनाकर खुद ही अपने लिए परेशानी खड़ी करते हैं।

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