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मानसिक समस्‍याओं से निजात कैसे पाएं ?

पिछले लेख में (इसे यहां पर क्लिक करके पढ़ें) हमने चर्चा की कि यदि किसी मानसिक रोग का सामना हम कर रहे हैं तो उसे कैसे पहचानें। अब प्रश्‍न यह है कि यदि हम मानसिक बीमारी के लक्षणों को महसूस कर रहे हैं तो क्‍या कदम उठाना चाहिए इसे ठीक करने के लिए।

यहां एक बात ध्‍यान में रखनी चाहिए कि मानसिक रोगों के इलाज में विशेषज्ञ से मिलना और उसकी राय बहुत महत्‍वपूर्ण है। इसके अलावा हमें अपने स्‍तर पर क्‍या करना है ये जानना भी बहुत जरूरी है। एक अच्‍छे विशेषज्ञ का चुनाव भी एक ऐसा बिंदु है जिस पर चर्चा की जाना जरूरी है।



बहुत से लोग जो मानसिक दिक्‍कतों से जूझ रहे हैं वे अक्‍सर शिकायत करते हैं कि दवाईयां लेने या अन्‍य उपायों के बावजूद उन्‍हें उतना लाभ नहीं हो रहा है या हालत में कोई विशेष सुधार नहीं दिख रहा है। इस कारण वे और भी निराश हो जाते हैं।

सबसे पहले बात करेंगे दवाओं की - यदि समस्‍या गंभीर है तो किसीअच्‍छे मनोचिकित्‍सक से मिलना जरूरी हो जााता है। इसका एक पहलू ये भी है कि केवल दवाएं आपको समस्‍या निजात नहीं दिला सकतीं हां शुरुआती तौर पर ये काफी मददगार साबित होती हैं बीमारी को नियंत्रित करने में परंतु मानसिक रोग के इलाज के लिए दवाओं पर ही निर्भर नहीं रहा जा सकता। उदाहरण के लिए कोई व्‍यक्ति नींद ना आने की बीमारी से, अत्‍यधिक चिंता, डिप्रेशन इत्‍यादि से ग्रसित है तो शुरुआत में उसे दवाएं देने से उसकी बिगड़ी हुई हालत को नियंत्रित करना अधिकतर मामलों मेंजरूरी हो जाता है। पर हालात एक हद तक नियंत्रित होने के बावजूद केवल दवाओं पर निर्भर रहना आपको आगामी चरण में अधिक लाभ नहीं पहुंचा सकता। समस्‍या के समाधान के लिए दूसरे आवश्‍यक उपायों को अपनाना भी उतना ही जरूरी है।

इसके बाद हम बात करते हैं अन्‍य उपायों के बारे में - सबसे पहले तो हमें समझ लेना चाहिए कि समस्‍या मानसिक स्‍तर पर उत्‍पन्‍न हुई है तो हमें उसके कारणों की पहचान करनी होगी,उसके बारे में खुलकर चर्चा भी करनी होगी और उसको ठीक करने के लिए निरंतर प्रयास भी करने होंगे। यहां सबसे जरूरी है इस बात को ध्‍यान में रखना कि मानसिक रोग के निदान में समय लगता है। जिस तरह एक बॉडी बिल्डिंग के शौकीन व्‍यक्ति को मजबूत मांसपेशियों को विकसित करने में समय लगता है उसी तरह जब हमारी मानसिकअवस्‍था बिगड़ी हुई होती है तो उसे सामान्‍य स्‍तर तक लाने में समय लग सकता है-कम या ज्यादा,ये मानसिक अवस्‍था और बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है। यदि कोई ये दावा करे कि उसके पास Depression, Anxiety, Mental Illness को तुरंत ठीक कर देने का कोई नुस्‍खा है तो हो सकता है कि उसके बताये तरीके से आपको शुरुआत में अच्‍छा महसूस हो पर कुछ समय बाद व्‍यक्ति उसी स्थिति में वापस लौट आता है। ऐसे दावे करने वाले ज्‍यादातर लोग इस विषय के विशेषज्ञ नहीं होते और बाद में इनके सुझाये हुए उपायों से निराशा ही हाथ लगती है।

मानसिक रोग में सबसे अहम भूमिका होती है एक परामर्शदाता ( Counselor ) या मनोवैज्ञानिक ( Psychologist ) की जो कि इस प्रकार के रोगियों से बात करके, उनकी समस्‍या को पूरी तरह समझकर, उसके निदान के लिए उठाये जाने वाले कदमों के बारे में सुझाव देते हैं। मानसिक रोगों का यह भी एक पहलू है कि कई बार एक अच्‍छे काउंसलर या साइकोथैरेपिस्‍ट की सलाह से भी रोगी ठीक हो जाते हैं बिना किसी दवा के। इस प्रकार के विशेषज्ञों द्वारा मरीज के साथ होने वाले थैरेपी या काउंसलिंग सेशन तभी ज्‍यादा कारगर होते हैं जब विशेषज्ञ अपने पेशे के प्रति समर्पित हो साथ ही मरीज भी इस बात को समझे कि विशेषज्ञ की भूमिका एक मार्गदर्शक एवं सहयोगी की ही है वस्‍तुत: उसके द्वारा सुझाये गये उपायों पर अमल रोगी को ही करना है। साथ ही रोगी कभी भी ये उम्‍मीद ना रखे कि किसी पेशेवर साइकोलॉजिस्‍ट या काउंसिलिंग एक्सपर्ट के पास कोई Instant Remedy है आपकी समस्‍या के लिए। मानसिक रुग्‍ण व्‍यक्ति को धैर्यपूर्वक एक्‍सपर्ट के साथ होने वाले सेशन में उपस्थित रहना होगा और किसी बड़े कदम की बजाय छोटे छोटे स्‍टेप्‍स पर काम करना होगा।

इन सब बातों अलावा यह जानना भी आवश्‍यक है कि यदि व्‍यक्ति किसी मानसिक परेशानी से जूझ रहा है तो उसे खुद के स्‍तर पर कौन से प्रयास करने चाहिए इससे बाहर आने के लिए। इस विषय पर हम अगले लेख में विस्‍तार से चर्चा करेंगे।

मानसिक रोग को स्‍वयं कैसे पहचानें ?

हममें से बहुत से लोग जब मानसिक रूप परेशान होते हैं और उसका कारण नहीं समझ पाते तो लगता है कि हमारे साथ ही ऐसा हो रहा है जबकि इसी प्रकार की समस्‍याओं का सामना दुनियाभर में और भी लोग कर रहे होते हैं। हम डर के मारे इसलिए किसी से इसके बारे में बात नहीं करते कि सामने वाला क्‍या सोचेगा फिर चाहे वह परिवार का ही सदस्‍य या हमारा कोई बहुत निकट मित्र क्‍यों ना हो और अमूमन ऐसा सोचना सही भी है क्‍योंकि मानसिक गड़बड़ी एक ऐसी परेशानी है जिसके बारे में आम इंसान ज्‍यादा जानता भी नहीं। केवल इस क्षेत्र से जुडे़ विशेषज्ञ या इस प्रकार की परेशानियों से परिचित लोग ही इसे समझ पाते हैं।


शारीरिक परेशानी और मानसिक परेशानियों में एक स्‍पष्‍ट अंतर हम सब समझ सकते हैं कि शारीरिक परेशानी से ग्रस्‍त व्‍यक्ति की परेशानी हर व्‍यक्ति को समझ में आती है। इसे आधुनिक चिकित्‍सा यंत्रों के माध्‍यम से मापा जा सकता है। जैसे यदि किसी व्‍यक्ति को बुखार है तो उसे नापा जा सकता है। ऐसे में यदि परेशानी हमारे काम-काज, दिनचर्या अथवा दूसरी गतिविधियों में बाधा बन रही है तो दूसरे भी इसके साथ तालमेल बिठाने को राजी हो जाते हैं। वहीं मानसिक समस्‍या एक ऐसा भंवर है जिसमें घिरकर रोगी स्‍वयं नहीं समझ पाता कि उसके साथ क्‍या हो रहा है और क्‍यों हो रहा है ? अब चूंकि मन कोई दिखाई देने वाली वस्‍तु तो है नहीं तो इससे जुड़ी परेशानी भी ना तो नजर आ सकती है ना ही समझ में आती है। इसे तो केवल रोगी महसूस ही कर सकता है। साथ ही गौर करने वाली बात ये है कि मानसिक परेशानियों या रोगों से ग्रस्‍त व्‍यक्ति कैसा महसूस कर रहा है इसे पकड़ना एक विशेषज्ञ के लिए भी कभी-कभी जटिल हो जाता है। ऐसे में स्‍वयं रोगी से तो उम्‍मीद ही नहीं की जा सकती कि वह अपने व्‍यवहार का कारण खोज सके और चूंकि वह स्‍वयं इससे अनभिज्ञ है तो उसके व्‍यवहार में होने वाले परिवर्तन से तालमेल बिठाने को लोग राजी नहीं हो पाते जब तक वे स्‍वयं इसकी गंभीरता को ना समझें। ऐसे में कार्यस्‍थल, सामाजिक और अन्‍य स्‍तरों पर तालमेल ना बैठ पाने पर रोगी अक्‍सर खुद को दोषी भी समझने लगता है और अलग-थलग पड़ने से अकेलेपन का शिकार हो सकता है। यह भी एक सच्‍चाई है कि बहुत कम मानसिक रोगियों को ही परिवार और प्रियजनों का साथ मिल पाता है और जरूरी मदद समय पर मिल पाती है। पर बहुतायत ऐसे लोगों की है जिनकी परेशानी ना कोई समझता है ना कोई ध्‍यान देता है, ना ही उन्‍हें इससे जुड़े विशेषज्ञों की सेवाएं सुलभ हो पाती हैं।

कुल मिलाकर यदि व्‍यक्ति इस प्रकार की समस्‍या से पीड़ि‍त है तो उसे इस विषय के बारे में थोड़ी जानकारी तो होनी ही चाहिए इससे पहले कि छोटी-मोटी समस्‍या गंभीर रूप धारण कर ले अथवा यदि वह पहले से ही गंभीर रूप से पीड़‍ित है तो इसे ठीक से पहचानकर जल्‍द से जल्‍द इससे छुटकारा पाने के प्रयासों में जुट जाए।

सबसे पहले हम बात करेंगे उन लक्षणों की जो संकेत करते हैं कि आप या तो किसी मनोरोग से पी‍ड़ित हैं या ये समस्‍या आपकी जिंदगी में दस्‍तक दे रही है-

- अपने रोजमर्रा के कामों को करने में मुश्किल आना

- बहुत उदासी या गहरी निराशा का अहसास

- नींद और खाने-पीने संबंधीआदतों में बदलाव

- मूड में बहुत ज्‍यादा उतार-चढ़ाव

- बहुत अधिक गुस्‍सा, चिढ़चिढ़ापन अथवा हिंसक हो जाना

- किसी एक ही विचार या एक ही प्रकार के विचारों से घिरे रहना और चाहकर भी उनसे पीछा ना छुड़ा पाना

- एकाग्रता की कमी हो जाना और छोटे छोटे काम करने में भी मुश्किल आना या समय लगना

- अत्‍यधिक डर, चिंता और घबराहट

- आत्‍महत्‍या  के  विचार आना

- सामाजिक गतिविधियों से दूरी बना लेना औरअपने आसपास के वातावरण से कटा हुआ महसूस करना

- छोटी-छोटी बातों पर बहुत ज्‍यादा नर्वस हो जाना

- कई तरह की शारीरिक परेशानियां जिनका कोई कारण पकड़ में नहीं आ रहा


ऊपर लिखी बातें मनोरोग का संकेत देती हैं पर यह सूची अपने आप में संपूर्ण नहीं है इसके अलावा भी अन्‍य प्रकार की समस्‍याओं का सामना रोगी को करना पड़ सकता है।

किसी रोग को खत्‍म करने की शुरूआत उसके बारे में जानने से होती है। किसी समस्‍या की जब तक हम पहचान नहीं कर लेते तब तक उसके निदान की ओर नहीं बढ़ सकते।

अगले लेख में हम बात करेंगे कि यदि कोई इन लक्षणों में से किसी का भी सामना कर रहा है या किसी भी  मानसिक अथवा भावनात्‍मक दिक्‍कत के कारण उसका सामान्‍य जीवन प्रभावित हो रहा है तो इससे निजात पाने के लिए कौन से कदम उठाए जाएं।

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