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मानसिक रोग को स्‍वयं कैसे पहचानें ?

हममें से बहुत से लोग जब मानसिक रूप परेशान होते हैं और उसका कारण नहीं समझ पाते तो लगता है कि हमारे साथ ही ऐसा हो रहा है जबकि इसी प्रकार की समस्‍याओं का सामना दुनियाभर में और भी लोग कर रहे होते हैं। हम डर के मारे इसलिए किसी से इसके बारे में बात नहीं करते कि सामने वाला क्‍या सोचेगा फिर चाहे वह परिवार का ही सदस्‍य या हमारा कोई बहुत निकट मित्र क्‍यों ना हो और अमूमन ऐसा सोचना सही भी है क्‍योंकि मानसिक गड़बड़ी एक ऐसी परेशानी है जिसके बारे में आम इंसान ज्‍यादा जानता भी नहीं। केवल इस क्षेत्र से जुडे़ विशेषज्ञ या इस प्रकार की परेशानियों से परिचित लोग ही इसे समझ पाते हैं।


शारीरिक परेशानी और मानसिक परेशानियों में एक स्‍पष्‍ट अंतर हम सब समझ सकते हैं कि शारीरिक परेशानी से ग्रस्‍त व्‍यक्ति की परेशानी हर व्‍यक्ति को समझ में आती है। इसे आधुनिक चिकित्‍सा यंत्रों के माध्‍यम से मापा जा सकता है। जैसे यदि किसी व्‍यक्ति को बुखार है तो उसे नापा जा सकता है। ऐसे में यदि परेशानी हमारे काम-काज, दिनचर्या अथवा दूसरी गतिविधियों में बाधा बन रही है तो दूसरे भी इसके साथ तालमेल बिठाने को राजी हो जाते हैं। वहीं मानसिक समस्‍या एक ऐसा भंवर है जिसमें घिरकर रोगी स्‍वयं नहीं समझ पाता कि उसके साथ क्‍या हो रहा है और क्‍यों हो रहा है ? अब चूंकि मन कोई दिखाई देने वाली वस्‍तु तो है नहीं तो इससे जुड़ी परेशानी भी ना तो नजर आ सकती है ना ही समझ में आती है। इसे तो केवल रोगी महसूस ही कर सकता है। साथ ही गौर करने वाली बात ये है कि मानसिक परेशानियों या रोगों से ग्रस्‍त व्‍यक्ति कैसा महसूस कर रहा है इसे पकड़ना एक विशेषज्ञ के लिए भी कभी-कभी जटिल हो जाता है। ऐसे में स्‍वयं रोगी से तो उम्‍मीद ही नहीं की जा सकती कि वह अपने व्‍यवहार का कारण खोज सके और चूंकि वह स्‍वयं इससे अनभिज्ञ है तो उसके व्‍यवहार में होने वाले परिवर्तन से तालमेल बिठाने को लोग राजी नहीं हो पाते जब तक वे स्‍वयं इसकी गंभीरता को ना समझें। ऐसे में कार्यस्‍थल, सामाजिक और अन्‍य स्‍तरों पर तालमेल ना बैठ पाने पर रोगी अक्‍सर खुद को दोषी भी समझने लगता है और अलग-थलग पड़ने से अकेलेपन का शिकार हो सकता है। यह भी एक सच्‍चाई है कि बहुत कम मानसिक रोगियों को ही परिवार और प्रियजनों का साथ मिल पाता है और जरूरी मदद समय पर मिल पाती है। पर बहुतायत ऐसे लोगों की है जिनकी परेशानी ना कोई समझता है ना कोई ध्‍यान देता है, ना ही उन्‍हें इससे जुड़े विशेषज्ञों की सेवाएं सुलभ हो पाती हैं।

कुल मिलाकर यदि व्‍यक्ति इस प्रकार की समस्‍या से पीड़ि‍त है तो उसे इस विषय के बारे में थोड़ी जानकारी तो होनी ही चाहिए इससे पहले कि छोटी-मोटी समस्‍या गंभीर रूप धारण कर ले अथवा यदि वह पहले से ही गंभीर रूप से पीड़‍ित है तो इसे ठीक से पहचानकर जल्‍द से जल्‍द इससे छुटकारा पाने के प्रयासों में जुट जाए।

सबसे पहले हम बात करेंगे उन लक्षणों की जो संकेत करते हैं कि आप या तो किसी मनोरोग से पी‍ड़ित हैं या ये समस्‍या आपकी जिंदगी में दस्‍तक दे रही है-

- अपने रोजमर्रा के कामों को करने में मुश्किल आना

- बहुत उदासी या गहरी निराशा का अहसास

- नींद और खाने-पीने संबंधीआदतों में बदलाव

- मूड में बहुत ज्‍यादा उतार-चढ़ाव

- बहुत अधिक गुस्‍सा, चिढ़चिढ़ापन अथवा हिंसक हो जाना

- किसी एक ही विचार या एक ही प्रकार के विचारों से घिरे रहना और चाहकर भी उनसे पीछा ना छुड़ा पाना

- एकाग्रता की कमी हो जाना और छोटे छोटे काम करने में भी मुश्किल आना या समय लगना

- अत्‍यधिक डर, चिंता और घबराहट

- आत्‍महत्‍या  के  विचार आना

- सामाजिक गतिविधियों से दूरी बना लेना औरअपने आसपास के वातावरण से कटा हुआ महसूस करना

- छोटी-छोटी बातों पर बहुत ज्‍यादा नर्वस हो जाना

- कई तरह की शारीरिक परेशानियां जिनका कोई कारण पकड़ में नहीं आ रहा


ऊपर लिखी बातें मनोरोग का संकेत देती हैं पर यह सूची अपने आप में संपूर्ण नहीं है इसके अलावा भी अन्‍य प्रकार की समस्‍याओं का सामना रोगी को करना पड़ सकता है।

किसी रोग को खत्‍म करने की शुरूआत उसके बारे में जानने से होती है। किसी समस्‍या की जब तक हम पहचान नहीं कर लेते तब तक उसके निदान की ओर नहीं बढ़ सकते।

अगले लेख में हम बात करेंगे कि यदि कोई इन लक्षणों में से किसी का भी सामना कर रहा है या किसी भी  मानसिक अथवा भावनात्‍मक दिक्‍कत के कारण उसका सामान्‍य जीवन प्रभावित हो रहा है तो इससे निजात पाने के लिए कौन से कदम उठाए जाएं।

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