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अंधेरे में रोशनी दिखाते स्‍वामी विवेकानंद के अनमोल विचार

मित्रों स्‍वामी विवेकानंद एक ऐसे प्रकाश स्‍तंभ की तरह हैं जिनका जीवन और विचार उन्‍नीसवीं सदी से लेकर आज इक्‍कीसवीं सदी में भी हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। अक्‍सर जब मन में कुछ निराशा आती है और कुछ भी समझ में नहीं आता ऐसे समय में स्‍वामी विवेकानंद के विचारों को पढ़कर मन में फिर से एक आशा जगती है और हिम्‍मत फिर जुटा पाने लायक स्थिति में हम आ पाते हैं।




हममें से हरेक का जीवन उतार चढ़ावों से भरा है एवं सकारात्‍मता और नकारात्‍मकता दोनों ही प्रकार की भावनाएं हमारे मन में आती जाती रहती हैं। कभी हम उत्‍साह और ऊर्जा से भरे हुए होते हैं और कभी हम थके हुए, टूटे हुए, निराशा में डूबे हुए होते हैं। जिस तरह प्रकाश की हमें जरूरत होती है अंधकार से निकलने के लिए वैसे ही मन के अंधेरों को प्रकाशित करने वाले विचार भी हमारे लिए जरूरी हैं। कोई ना कोई एक ऊर्जा का स्रोत होना चाहिए जहां से, घर में आने वाली बिजली की लाइन की तरह, प्रकाश की व्‍यवस्‍था हमारे मन-मस्तिष्‍क को लगातार मिलती रहे। स्‍वामीजी को एक ऐसे ही ऊर्जा-स्रोत और प्रेरणा पुंज की तरह मैं देखता हूं।

समय-समय पर इन सुविचारों को पढ़ना हमारा हौसला और जीवटता बनाये रखता है -


1- अपने स्‍नायु शक्तिशाली बनाओ। हम लोहे की मांसपेशियां और फौलाद के स्‍नायु चाहते हैं। हम बहुत रो चुके, अब और ना रोओ। अपने पैरों पर खड़े हो और मनुष्‍य बनो।


2- विश्‍व में बहुत से लोग इसलिए असफल हो जाते हैं क्‍योंकि उनमें समय पर साहस का संचार नहीं हो पाता।


3- जो तुम सोचते हो वो हो जाओगे। यदि तुम खुद को कमजोर समझते हो, तुम कमजोर हो जाओगे। अगर तुम खुद को ताकतवर समझते हो तो ताकतवर हो जाओगे।


4- स्‍वयं को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।


5- किसी चीज से डरो मत। तुम अदभुत काम करोगे। यह निर्भयता ही है जो क्षण भर में परम आनंद लाती है।


6- जो कुछ भी तुम्‍हें कमजोर बनाता है- शारीरिक,बौद्धिक या मानसिक उसे जहर की तरह त्‍याग दो।


7- किसी दिन जब आपके सामने कोई समस्‍या ना आये,आप सुनिश्चित सकते हैं कि आप गलत रास्‍ते पर चल रहे हैं। 


8- एक समय में एक काम करो और ऐसा करते समय अपनी आत्‍मा उसमें डाल दो और बाकी सब भूल जाओ।


9- ब्रह्मांड की समस्‍त शक्तियां पहले से हमारे पास हैं। ये हम ही हैं जो अपनी आंखों को बंद कर अंधेरे का रोना रोते हैं।


10- उठो मेरे शेरों, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो। तुम एक अमर आत्‍मा हो, स्‍वच्‍छंद जीव हो, धन्‍य हो, सनातन हो। तुम तत्‍व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्‍व तुम्‍हारा सेवक है तुम तत्‍व के सेवक नहीं।

डिप्रेशन को बढ़ाने वाली इन आदतो को कहें बाय बाय

कई बार हमारी बहुत सी छोटी छोटी आदतें हमारी निगेटिव थिंकिंग या डिप्रेशन को और बढ़ा रही होती हैं। एक तरफ तो हम इससे बाहर निकलने की कोशिश कर रहे होते हैं। दूसरी तरफ कुछ बातें हमारी समस्‍या को और बढ़ा रही होती हैं। जरूरी नहीं कि हम जानबूझ कर ही इन आदतों को नहीं छोड़ना चाहते बल्कि होता ये है कि हमें अक्‍सर पता ही नहीं होता कि ये बातें भी हमारी परेशानी के लिए खाद-पानी का काम कर रही हैं।

ये बातें हैं तो बहुत छोटी पर इन पर थोड़ा सा ध्‍यान देने से ही आपकी समस्‍या काफी हद तक कंट्रोल में आ सकती है।



दोस्‍तों, हमें शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरीकों से स्‍वस्‍थ रखने में हमारी Daily Habits का बड़ा हाथ होता है। हमारी बहुत सी रोज की आदतों में कुछ ऐसी बातें शामिल होती हैं जो हमारी समस्‍या का कारण भी हो सकती हैं और उनको बढ़ाने का काम तो करती ही हैं। यहां हम किसी नयी आदत को शामिल करने के बारे में बात नहीं करेंगे। हम यहां चर्चा करेंगे कि कौन सी बातें हैं जिन्‍हें हमें या तो छोड़ना चाहिए या फिर उनकी तरफ ध्‍यान देना बंद कर देना चाहिए।

चलिए आज से ही इन आदतों को बाय-बाय कर देते हैं-

1- सबसे पहले हम ध्‍यान देंगे कि हमारे दिन की शुरुआत करने का क्‍या तरीका है। ज्‍यादातर लोग सुबह उठकर चाय-कॉफी से अपना दिन शुरू करते हैं। चाय-कॉफी आप ले सकते हैं पर इसमें थोड़ा सा बदलाव करें। सुबह उठकर सबसे पहले दो या तीन गिलास पानी पियें। ये आपके शरीर को ऊर्जा देगा और रात के लंबे अंतराल के बाद हाइड्रेट करेगा। चाय या काॅफी इसके कम से कम आधा घंटे बाद लें।

2- दूसरी बात भी सुबह की हमारी आदत से जुड़ी है- समाचार-पत्र पढ़ना। ये एक बहुत खतरनाक आदत है खासकर ऐसे व्‍यक्ति के लिए जिसका दिमाग पहले से ही नकारात्‍मक विचारों से भरा हुआ है। साथ ही दिनभर भी बेवजह और व्‍यर्थ की खबरों को सुनने, देखने और पढ़ने से बचें। केवल जरूरी  खबरें पढ़ें वो भी अपने जरूरी काम निपटाने के बाद।

4- ज्‍यादातर समय घर में ही गुजारना या अकेले रहने की आदत। डिप्रेशन के शिकार लोगों में अकेलेपन की भी आदत हो जाती है। डिप्रेशन हमारी ऊर्जा को बहुत कम कर देता है इसलिए भी हमारा मन कहीं जाने का नहीं होता। फिर धीर-धीरे यह आदत सी बन जाती है। बहुत ज्‍यादा नहीं पर कोशिश करें जितना हो सके खाली वक्‍त में घर के बाहर निकलें और लोगों से मिलें। कम से कम घर से लगी सड़क पर ही टहलना शुरू करें।

5- सूर्य की रोशनी से दूर रहना। सूरज की खुली धूप हमारे अंदर सकारात्‍मकता और ऊर्जा लाती है। कम रो‍शनी में या लंबे समय तक प्राकृतिक रोशनी से दूर रहने वाले लोगों में डिप्रेशन के लक्षण जल्‍दी आने लगते हैं। विटामिन डी की कमी निराशावादी विचारों को बढ़ाती है।

6- सुबह उठते ही फोन हाथ में  लेने की आदत और हर समय फोन चैक करने आदत। फोन में आने वाले नोटिफिकेशन आते ही चैक करते समय हम भूल जाते हैं कि उन्‍हें तुरंत ही ना देखने से हमारा कोई काम बिगड़ नहीं जाएगा जब तक वे हमारे व्‍यवसाय या काम से संबंधित ना हों। डिजिटल युग में आगे रहने का मतलब ये नहीं कि जिन बातों से हमारा कुछ बनना-बिगड़ना नहीं उन्‍हें बेवजह समय दिया  जाए।

7- सोशल मीडिया एक बहुत ही अच्‍छा टूल है लोगों से जुड़ने और उन तक अपनी बात पहुंचाने का। पर इसका बेवजह या यूं ही उपयोग करते रहने से केवल टाइम वेस्‍ट ही नहीं होता है बल्कि उससे भी बढ़कर ये हमें कई तरीकों से प्रभावित करता है। हम बेवजह दूसरों की लाइफ और लाइफस्‍टाइल पर इतना ध्‍यान देने लग जाते हैं और हमें लगता है कि दूसरों की जिंदगी में सब अच्‍छा चल रहा है और फिर हम अपने वर्तमान के प्रति शिकायतों से भर जाते हैं। ये एक प्रकार का एडिक्‍शन भी है और यदि हमारी जिंदगी में सब कुछ ठीक नहीं है या हम उतने सफल नहीं हैं तो दूसरों से तुलना कर अनजाने में ही हम अपनी निराशा को बढ़ाते हैं।

8- रात को सोने से पहले फोन,टीवी या कंप्‍यूटर में आंखें गड़ाये रखने कीआदत। रात होने पर हमारे दिमाग में मेलाटोनिन हार्मोन सक्रिय हो जाता है जो हमारी अच्‍छी नींद के लिए जरूरी है पर आज के डिजिटल युग की हमारी आदतों से अच्‍छी नींद के लिए जरूरी हारमोन का स्रावित होना प्रभावित होता है। हमारे शरीर और मन को आराम देने की सबसे बड़ी रिलैक्‍शेसन तकनीक है अच्‍छी नींद। अगर हम नींद अच्छी लेंगे तो ना तो हमें मन को शांति देने वाली तकनीकों, तरकीबों और थैरेपीज की खोज करनी होगी और हम बहुत हद तक अवसाद जैसी समस्‍याओं पर भी नियंत्रण कर सकेंगे। मनुष्‍य के अलावा किसी भी अन्‍य प्राणी को मन को शांत रखने के लिए और अच्‍छी नींद के लिए ना किसी से सलाह लेने की जरूरत पड़ती है ना ही किसी तकनीक को आजमाने की। ये अपने आप ही हो जाता है क्‍योंकि सभी जीव अपनी बॉडी-क्‍लॉक के अनुरूप दिनचर्या पर ही चलते हैं। जबकि हम अपनी जैविक घड़ी या Body Clock के विपरीत आदतें अपनाकर खुद ही अपने लिए परेशानी खड़ी करते हैं।

हमेशा चिंता करने से ऐसे बचें

चिंता के बुरे प्रभावों से तो हम अच्‍छे से परिचित हैं पर फिर भी चिंता करना नहीं छोड़ पाते। असल में चिंता करने वाले इंसान की ये आदत बन जाती है कि वह चिंता किये बिना रह नहीं पाता। एक चिंता खतम हुई तो दूसरी शुरू और हमेशा चिंतित रहने का ये अंतहीन सिलसिला कभी खतम ही नहीं होता।




तो कैसे चिंता के इस चक्रव्‍यूह को तोड़ा जाए ?

हम सबके शरीर के काम करने की एक सीमा होती है। हम एक निश्चित मात्रा तक ही वजन उठा सकते हैं उससे ज्‍यादा नहीं। उसी तरह हमें खुद को मानसिक रूप से संतुलित रखने के लिए भी यही बात समझनी होगी। हम अक्‍सर ऐसे विचारों का बोझा अपने दिमाग पे डालते जाते हैं जिनकी कोर्इ जरूरत नहीं। कल्‍पना करें कि ज्‍यादा बोझ उठाकर हम कितनी दूरी तक चल सकते हैं थोड़ा चलने से ही हम थक जायेंगे। पर हम अपने दिमाग की ये हालत कर देते हैं कि ये एक ओवरलोडेड गाड़ी की तरह धीरे-धीरे मुश्किल से चल पाता है फिर भी हम इस पर लोड बढ़ाये ही जा रहे हैं। ऐसे में दिमाग की काम करने की क्षमता का तो बुरा हाल होता ही है धीरे-धीरे दिमाग और शरीर दोनों ही खोखले होते जाते हैं।

चिंता या एंजाइटी परेशान करती ही क्‍यों है? इसका एक सीधा सा कारण है कि ऐसा व्‍यक्ति या तो बीते समय की बातों में डूबकर  परेशान रहता है या फिर भविष्‍य में कुछ बुरा ना हो जाए ऐसा सोच-सोचकर परेशान होता रहता है। जबकि वास्‍तविकता में दोनों ही बातें हमारी मेमोरी और कल्‍पना हैं बस। वास्‍तविकता में तो कुछ हैं ही नहीं। वास्‍तविकता में हमारे सामने है वर्तमान और उसी में रहना इस समस्‍या का हल है। पर सवाल ये है कि वर्तमान में रहा कैसे जाए ?

वर्तमान में कैसे रहना है इस विषय पर बहुत सा ज्ञान आपको मिल जाएगा। पर क्‍या वाकई ये इतना आसान है ? जवाब है नहीं और खासतौर पर ऐसे व्‍यक्ति के लिए जो लंबे समय से चिंता करने की आदत से परेशान है।

वर्तमान में जीना सीखने का एक बेहतरीन तरीका है आज के दिन में जीना और आज किये जाने वाले कामों को पूरा करना। आज के दिन में जीने का ये भी मतलब नहीं कि भविष्‍य की कोई योजना ना बनाएं। योजना जरूर बनाएं उसके बाद हर दिन हमें ये करना है कि आज के दिन में हम जितना कर सकते हैं बस उतना ही करना। अगर हम किसी समस्‍या से जूझ रहे हैं तो उसे हम एक दिन में दूर नहीं कर सकते। रोज जितना हो सकता है उतना करना शुरू करें तो एक ना एक दिन तो हम उससे भी बाहर निकल ही आयेंगे। 

अगर एक ही दिन में या एक ही बार में हम सारे काम करने की कोशिश करेंगे या एक ही झटके में किसी समस्‍या  को उखाड़ फेंकने की कोशिश करेंगे तो ये संभव तो नहीं पर नुकसान ये होगा कि आज जो कर रहे हैं उसे भी ठीक से नहीं कर पायेंगे। 

अगर हम आज का भोजन करते समय कल, परसों और आगे के दिनों में मिलने वाले भोजन की चिंता करें तो ना तो आज का भोजन ही हमें कोई पोषण देगा और अगर कई सारे दिनों का भोजन अगर हमें एक साथ दे भी दिया जाए तो क्‍या एक बार में हम उसे खा पायेंगे ?

कुछ बहुत नाउम्‍मीद हो चुके लोग तो अपने भविष्‍य की चिंताओं का बोझ इतना बढ़ा चुके होते हैं कि उनको लगता है कि अब उनके हाथ में कुछ भी नहीं है।

पर केवल और केवल ध्‍यान में रखने वाली सबसे बड़ी बात है कि बीता हुआ कल कैसा भी रहा हो और आने वाला कल कैसा भी हो, हर रोज हमें जो चौबीस घंटे मिले हैं, उनमें जीने से और उनका इस्‍तेमाल करने से हमें कोई रोक नहीं सकता। भले ही सब कुछ हमारे हाथों से फिसलता लग रहा हो पर आज का दिन तो हमारी मुट्ठी में है, इसे हमसे कोई नहीं छीन सकता। तो क्‍यों ना हम आज सुबह उठने से रात को सोने तक जो कर सकते हैं उसके बारे में ही सोचें।

डिप्रेशन और चिंता को भगाने के कुछ प्रैक्टिकल टिप्‍स

दोस्‍तों, पिछले लेख में हमने मानसिक समस्‍या के बारे में एक्‍सपर्ट की भूमिका के विषय में चर्चा की।

यहां हम बात करेंगे कुछ ऐसे Practical Tips के बारे में जिन्‍हें अपनाकर हम अपने Depression, Anxiety Disorder, Stress से काफी  हद  तक खुद ही लड़ सकते हैं।

वैसे तो बहुत से तरीके आपको  पढ़ने या सुनने  को मिले होंगे अगर आपने इस विषय पर जरा भी खोजबीन की है पर कई उपायों के पता होने के बावजूद  समस्‍या ये आती है कि हम उनको Follow नहीं कर पाते या कहें इतनी इच्‍छाशक्ति नहीं जुटा पाते और हमारा हाल समय गुजरने के बावजूद वही का वही रहता है। हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाते। असल में होता ये है कि अवसाद यानी डिप्रेशन, अत्‍यधिक चिंता, एंजाइटी डिसऑर्डर और तनाव हमें उस स्थिति में ले आता  है कि हमारे Will Power की तो हवा ही निकल चुकी होती है ऐसे में यदि हमें कोई तरीका भी  इससे निकलने का पता हो तो उसे करना भी हमारे लिए कठिन हो जाता है क्‍याेंकि इन सारी समस्‍याओं से जूझ रहे व्‍यक्ति के लिए आसान से या सामान्‍य दिखने वाले काम तक करना कठिन होे जाता है स्‍वस्‍थ इंसान की तुलना में।



ऐसे में हम जानेें गे कि क्‍या ऐसे उपाय हैं जिन्‍हें जबरदस्‍ती खुद  पर थोपने की कोशिश करने और उसके बावजूद ना कर पाने पर खुद को कोसने की बजाय उनके आसान विकल्‍पों को जितना हो सके उतना करने  की कोशिश करें।


मेडीटेशन की बजाय अपना पसंदीदा विकल्‍प चुनें-
ध्‍यान अथवा Meditation करने की सलाह शायद सबसे ज्‍यादा दी जाने वाली  सलाह है। चाहे कोई मेंटल हेल्‍थ के विषय में जानता हो या ना जानता हो अक्‍सर सलाह देता है कि मेडीटेशन करो। पर मेडीटेशन करना इतना सरल या सामान्‍य सा काम नहीं है जितनी आसानी से इसे करने की सलाह देने वाले मिल जाते हैं। खासकर Mental Health Issues से जूझ रहे व्‍यक्ति के लिए तो ये और भी कठिन हो जाता है क्‍योंकि ना तो उसका मन किसी चीज में लगता है ना ही मन में चल रहे विचारों की भीड़ से वह एक मिनट भी निकल पाता है। सबसे बड़ी बात कि ध्‍यान के स्‍तर तक मन को लाने में बहुत लंबा समय लगता है जबकि समस्‍या का सामना कर रहे व्‍यक्ति के लिए एक जगह नियमित कुछ समय के लिए बैठना भी बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में वह हताश होकर इसे छोड़ देता है।
इसके बजाय आप कोई ऐसी एक्टिविटी चुनें जिसे करने में आपको ज्‍यादा कोशिश ना करनी पड़े। आप सुबह उठकर किसी बगीचे या शांत जगह पर कुछ देर बैठ सकते हैं। आप अपने पसंदीदा संगीत को भी सुन सकते हैं एक जगह बैठकर, वीडियो देखने की बजाय आंखें बंद करके ऑडियो सुनना ज्‍यादा सुकून दे सकता है।

प्राणायाम या डीप ब्रीदिंग की बजाय यह करें-
प्राणायाम वाकई एक बहुत ही अच्‍छा उपाय है मानसिक तकलीफों को काबू करने और मन को शांत रखने के लिए। परंतु इसे नियमित और अनुशासित तरीके से करते रहने से ही हमें इसके फायदे मिलेंगे। जब हमारी बेचैनी या उदासी बहुत ज्‍यादा होती है तो इस प्रकार का अनुशासन और निरंतरता मुश्किल हो जाती है। आजकल  Deep Breathing करने की भी सलाह बहुत दी जाती है। प्राणायाम एवं डीप ब्रीदिंग यानी गहरी सांस दोनों से ही हमारे शरीर में ऑक्‍सीजन का प्रवाह बढ़ता है जो तनाव को घटाता और मूड को अच्‍छा और शांत महसूस कराता है। इसके लिए हम ये भी कर सकते हैं कि पैदल चलते हुए गहरी सांसें लें। चाहे आप किसी पार्क में टहलें या घर की छत पर। इससे डीप ब्रीदिंग के साथ साथ सबसे आसान सा व्‍यायाम यानी Walking भी साथ में हो जाएगी।


कसरत अपने पसंदीदा विकल्‍पों में से चुनें-
कसरत निस्‍संदेह मानसिक रूप से आपको मजबूत बनाती है और इसे करने से हैप्‍पी हॉर्मोन एंडोर्फिन भी बनता है जिससे हम अच्‍छा महसूस करते हैं।अगरआपने पहले नियमित रूप से कसरत करने, फिटनेस पर काम करने जैसी गतिविधियों में हिस्‍सा नहीं लिया है और आप इसे एंजॉय नहीं करते  हैं तो शायद शुरू करने के बाद आप इसे नियमित ना रख पायें। पर खुशी की बात ये है कि हमारे माइंड में हैप्‍पी हॉर्मोन बनाने के लिए हमारे पास और भी विकल्‍प हैं जिन्‍हें करने से आपको शायद ज्‍यादा खुशी भी मिले।
आप कोई आउटडोर गेम खेल सकते हैं, अगर आपके घर पर  या  आसपास बच्‍चे हों तो उनके  साथ खेलने  में आपको ज्‍यादा मजा आएगा। आप Swimming कर सकते हैं। आपको यदि डांस करना पसंद है तो इसे करने से आपको बहुत अच्‍छा लगेगा। आप साईकिल से कहीं भी घूमने निकल जायें और सबसे आसान एक्‍सरसाइज है पैदल चलना आप लंबी वॉक पर निकल जाएं।

विटामिन डी लें-
विटामिन डी की कमी निराशाा और नकारात्‍मक विचारों ( Negative Thinking ) को बढ़ाती है। आजकल विटामिन डी की कमी की समस्‍या बहुत तेजी से बढ़ी है साथ ही साथ मानसिक बीमारियां भी बड़ी तेजी से बढ़ रही हैं। नियमित रूप से सुबह हल्‍की धूप में कम से कम 15-20 मिनट जरूर बिताएं और इस समय ऐसे कपड़े पहनें जो शरीर को बहुत ज्‍यादा ना ढकें। 

इस प्रकार के लोगों से जरूर  मिलें-
मानसिक बीमारी के दौर में अक्‍सर हम अकेलापनऔर हीनभावना से ग्रसित हो जाते हैं। ऐसे में हम किस प्रकार के लोगों के साथ रहें इसका हमें ध्‍यान रखना होगा जैसे शारीरिक बीमारी में भी हमें कुछ परहेज करने पड़ते हैं। चाहे आप कैसा भी महसूस करें पर ऐसे लोगों के साथ जरूर समय बितायें जो आपको जज नहीं करते। आपकी सफलता, असफलता या किसी भी अन्‍य दूसरे कारण से उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वे बस आपके साथ हैं तो हैं। ऐसे लोगों का साथ आपके लिए टॉनिक की तरह काम करेगा। 

अपने शौक को जरूर पूरा करें-
भले आप दिनभर में केवल आधा घंटा ही निकाल पायें अपने शौक के लिए परंतु इसे नियमित करें एक थैरेपी की तरह। ना तो इसे समय की बर्बादी समझें ना दूसरे जरूरी कामों के लिए इसे छोडे़ं। ऐसे समझें कि अगर आपको किसी चोट अथवा बीमारी के बाद रोज एक फिजियोथैरेपिस्‍ट के यहां जाकर एक घंटा बिताना हाेता है तब आप इसे कभी मिस नहीं करते क्‍योंकि ये आपके शरीर को ठीक करने का सवाल है। तो जहां हमारा मन बीमार है तो हमें उसके लिए भी तो थैरेपी नियमित ही चाहिए। इसलिए इसके लिए समय जरूर निकालें।

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