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परीक्षा परिणाम के दौर में पेरेंट्स के लिए जरूरी टिप्‍स

Parenting tips to guide children for bright future and facing failures (Hindi)

अभी एक न्‍यूज पढ़ने को मिली कि एक दसवीं क्‍लास के बच्‍चे की मां ने सोशल मीडिया पर शेयर किया कि वे अपने बच्‍चे की बोर्ड परीक्षा में 60% लाने पर खुश हैं।

जहां आजकल इस तरह की खबरों से अखबार भरे पड़े हैं कि किसके किस विषय में  100 में से 100 अंक आए, या किसने कितने घंटों रोज पढ़ाई की। वहां इस तरह की खबर सुनकर अच्‍छा लगा कि इस तरह के भी पेरेंट्स हैं जो बच्‍चों की क्षमता को स्‍वीकार कर रहे हैं, उसे सेलिब्रेट कर रहे हैं।

आजकल Exam में पास या फेल होना कोई मुद्दा नहीं रह गया है। मुद्दा है तो ये कि कौन 90 प्रतिशत की बाउंड्रीलाइन से पीछे है और कौन उससे आगे। सफलता के लिए मापदंड समय के साथ में इतने बदल गए हैं कि ज्‍यादातर लोग उस सीमारेखा को ना छू पाने को ही असफलता मान लेते हैं। 

अगर हम उम्‍मीद करें कि इस नंबर गेम वाली शिक्षा व्‍यवस्‍था में कोई बदलाव आएगा तो ऐसा फिलहाल तो होता नजर नहीं आ रहा। तब तक ना जाने कितने छात्र निराशा, हताशा, हीनभावना से दबकर अपनी संभावनाओं को, जीवन तक को मिट्टी में मिला चुके होंगे।


ऐसे में अगर हम पेरेंट्स हैं या हमारे घर में बच्‍चे हैं तो हमें क्‍या करना है हमें इस बारे में सोचना है। सिस्‍टम, अवसरों की कमी, कंपटीशन या बच्‍चाें को दोष देना समस्‍या को बढ़ावा देना है। केवल हमें ही जिम्‍मेदारी उठानी है ऐसा सोचकर ही हम बच्‍चों को समर्थ बना सकेंगे।

वैसे तो इस विषय पर बहुत लंबी बात की जा सकती है पर संक्षेप में कुछ बिंदुओं पर चर्चा की जाना जरूरी है -

1- पढ़ाई के बारे में हर वक्‍त चर्चा सही नहीं- कुछ लोग जब भी बच्‍चों से बात करेंगे तो उनकी पढ़ाई से ही संबंधित बातें करेंगे। दूसरों का उदाहरण देंगे और दूसरों से जब भी बातें करेंगे तो बताएंगे कि उनका बच्‍चा तो पढ़ने पे ही पूरा ध्‍यान लगाता है। ऐसे में बच्‍चे पर दबाव रहता है कि उसकी हर गतिविधि Results Oriented होनी चाहिए। लाइफ में पढ़ाई ही सब कुछ नहीं है ये बात Students से ज्‍यादा Parents को समझनी होगी। ज्‍यादातर माता-पिता की हमारे परंपरागत भारतीय समाज में यही सोच रहती है कि पढ़-लिख लोगे तो कुछ बन जाओगे। पढ़ाई बेशक जरूरी है भले औसत दर्जे की हो पर आज केवल पढ़ लेने भर से कोई कुछ बन जाएगा इसकी गारंटी नहीं। देश के हर शहर और गांव में अनगिनत डिग्रीधारी घूम रहे हैं। 

2- कुछ बन जाओ तब  ये सब करना-स्‍कूल या कॉलेज में पढ़ने वाले बच्‍चों से अक्‍सर ये कहा जाता है। Students पर वैसे भी काफी दबाव होता है- पढ़ाई का, पेरेंट्स का और आसपास के वातावरण का भी जहां दूसरों से हमेशा उसकी तुलना होती है। ऐसे में इस तरह की बातें उन परऔर दबाव बनाती हैं। बेशक Career बहुत जरूरी है पर जीवन को जीना भी कम महत्‍वपूर्ण नहीं। वर्तमान में होने वाली आनंदपूर्ण गतिविधियों से बच्‍चों को दूर रखना भी उनके विकास के लिए एक बाधा साबित हो जाता है।

3- बच्‍चों को फाइनेंस के बारे में  शिक्षित नहीं करना- बहुत से पेरेंट्स ऐसा भी व्‍यवहार करते हैं कि बच्‍चों को छोटे-माेटे कामों से भी दूर रखते हैं। तुम बस पढ़ाई करो बाकी सब हम कर लेंगे। ऐसे में बच्‍चे छोट-छोटे काम भी नहीं सीख पाते। पैसा कैसे खर्च करना है, कैसे बचाना है, पैसा कहां निवेश किया जाता है इसके बारे में वे बिलकुल नहीं जानते। उनकी सारी जरूरतें पूरा करने का रेडीमेड सिस्‍टम बना हुआ होता है घर में। ऐसे में पैसा बनाने और उसे संभालने लायक होने की उम्र में उन्‍हें बहुत दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है। बड़े बिजनिस लीडर्स ने भी छोटी उम्र में बहुत छोटे बिजनेस किये हैं जिनसे उन्‍होंने पैसे का गणित समझा।

4- मार्कशीट में अंकों से ज्‍यादा जरूरी हैं दूसरी चीजें- हमें अपने बच्चों को ये समझाना चाहिए और खुद भी ये समझना चाहिए कि किसी भी करियर में सफलता के लिए जरूरी चीजें हैं - आत्मविश्वास, लगातार मेहनत और संवाद की कला (communication skills).  किसी विषय के बारे में केवल पढ़ाई करने भर से सफलता का कोई संबंध नहीं। जब तक आपके काम की कोई Value नहीं तब तक आपके दिमाग में भरे ज्ञान का कोई मतलब नहीं। आपका काम आपको सफलता तभी दिलाएगा जब वो किसी के लिए उपयोगी हो। हम कितनी ही Knowledge इकट्ठा कर लें या कितने ही अच्‍छे Marks लेकर आयें पर किसी काम को करने की योग्‍यता का इससे ज्‍यादा लेना देना नहीं। पढ़ाई और काम करना ये दोनों काफी अलग हैं आपस में। 

5- निर्णय लेना व समस्‍याओं का सामना करने की क्षमता विकसित करना- ये इतने महत्‍वपूर्ण गुण हैं जो यदि बच्‍चे सीख पाएं तो जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए उन्‍हें डिग्री या सर्टिफिकेट का मोहताज नहीं होना पड़ेगा। इसके लिए हम पैरेंट्स को थोड़ा हिम्‍मत और धैर्य से काम लेना होगा और बच्‍चों को थोड़ी स्‍वतंत्रता देनी होगी। केवल किताबें रटने और अच्‍छे मार्क्‍स लाने भर से ना तो उनमें निर्णय लेने की क्षमता ( Decision Making ) आएगी और ना ही वे असफलता और मुश्किलों का सामना करने को तैयार रहेंगे। हमें खुद भी समझना होगा कि कोई भी असफलता अंतिम नहीं होती और कोई भी विकल्‍प अंतिम नहीं होता। यदि बच्‍चा किसी क्षेत्र में असफल होता है तो उसे समझाना चाहिए कि दुनिया में अनगिनत विकल्‍प हमेशा मौजूद हैं और बार बार भी फेल होते हैं तो वह भी बेकार नहीं जाता, अनुभव देकर ही जाता है और आजकल तो बहुत सारे लोग अपने अनुभव बांटकर ही पैसा कमा रहे हैं।


डिप्रेशन के बारे में कुछ गलत धारणाएं

डिप्रेशन से आज के समय में बहुत लोग प्रभावित हैं पर इसके बारे जानकारी बहुत ही कम है। कम जानकारी का होने से ही इसके बारे में लोगों में बहुत सी भ्रांतियां हैं। इसी कारण से इसको कई बार लोग हल्‍के में लेते हैं या मनमाफिक सलाह देने लगते हैं।

आजकल इस शब्‍द का प्रयोग भी इसी कारण ज्‍यादा होता हैं क्‍योंकि लोग जानते ही नहीं कि डिप्रेशन क्‍या है? अक्‍सर लोग कहते हुए मिलेंगे कि आज मैं बहुत डिप्रेश्‍ड हूं या कोई व्‍यक्ति किसी भी कारण से उदास है तो लोग कहेंगे कि वो अभी थोड़ा  Depressed है।

असल में Depression या अवसाद में  'थोड़ा' शब्‍द जोड़ना भी एक समस्‍या है जिसके कारण लोग इसे छोटी-मोटी समस्‍या मानते हैं और ज्‍यादा ध्‍यान नहीं देते। जबकि आज ये महामारी की तरह बढ़ रही है। किसी भी बीमारी के बारे में सही और जरूरी जानकारी का होना उसके उपचार में सहायक होता है। बीमारी के बारे में जानकारी के अभाव में मरीज समस्‍या तो बढ़ ही रही होती है, उसके परिवार या आसपास के लोग भी उसकी सहायता के बारे में जरूरी कदम नहीं उठा पाते।



आज हम कुछ ऐसे बिंदुओं पर बात करेंगे जिनके बारे में  स्‍पष्‍ट जानकारी होना बहुत जरूरी है उनके लिए जो खुद इस बीमारी से जूझ रहे हैं या उनसे जुड़ा कोई व्‍यक्ति इससे पीडि़त है।

डिप्रेशन कोई बड़ी बीमारी नहीं है- यह एक आम धारणा है इसके बारे में। इसका एक कारण ये भी है कि जो पीडि़त व्‍यक्ति है वह भी इसके बारे में किसी से ज्‍यादा चर्चा नहीं करता। उसके व्‍यवहार में परिवर्तन अवश्‍य होता है पर वह क्‍या महसूस कर रहा है इसकी चर्चा बहुत कम होती है। उसे लगता है कि लोग क्‍या कहेंगे अगर वह अपनी परेशानी शेयर करता है और डिप्रेशन के केसेज में मरीज असहाय ( Helpless ) महसूस करता है इसलिए उसकी परेशानी उसके अलावा कोई ऐसा व्‍यक्ति नहीं समझ पाता जो डिप्रेशन के बारे में ना जानता हो। इसलिए जिन्‍होंने इस समस्‍या का सामना ना किया हो उनकी ये राय बन जाती है कि ये एक गंभीर बीमारी नहीं है। जबकि अवसाद से ग्रस्‍त व्‍यक्ति आत्‍महत्‍या तक कर लेता है इसलिए इसे गंभीरता से लेना और उपचार शुरू करना बहुत जरूरी है वरना स्थिति भयावह हो सकती है।

डिप्रेशन पॉजिटिव सोचने से सही हो सकता है- कई बार डिप्रेशन से प्रभावित व्‍यक्ति खुद भी ऐसा ही सोचता है पर ऐसा करना उसकी मदद नहीं कर पाता। डिप्रेशन के बारे में ऐसा सोचना या किसी से ऐसा कहना उसकी समस्‍या को अक्‍सर बढ़ा ही रहा होता है। चूंकि यह एक बीमारी है और कोई छोटी-मोटी बीमारी नहीं है तो इसका निदान भी इसे बीमारी समझकर ही करना चाहिए। जब तक हम सही कदम नहीं उठाते इसे ठीक करने के लिए तब तक इस तरह की बातों से हमें कोई मदद नहीं मिल सकती।

डिप्रेशन कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाता है- ज्‍यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता है और ऐसा सोचकर हम एक ऐसे व्‍यक्ति जिसको सहायता की और इलाज की जरूरत है उसकी मदद करने की बजाय उसे उसके हाल पर छोड़ देते हैं। इसे भी हमें अन्‍य बीमारियों की तरह ही लेना चाहिए, शारीरिक बीमारियों और मानसिक बीमारी के उपचार के तरीके कुछ अलग हो सकते हैं जैसे शारीरिक बीमारी में दवाईयां ज्‍यादा सहायता करती हैं जबकि इसमें मानसोपचार ( Pychotherapy ) या काउंसलिंग ( Psychological Counselling ) बहुत मदद करती है।

उदासी, दुख आदि डिप्रेशन ही हैं- उदास होना, दुखी होना,मन ना लगना इस तरह की भावनाएं हर किसी के जीवन में आती हैं पर डिप्रेशन इससे कहीं बढ़कर है। डिप्रेशन के कुछ लक्षणों में से यह भी हैं पर जब ये भावनाएं लंबे समय तक बनी रहें और व्‍यक्ति की दिनचर्या, सामान्‍य कार्यकलाप व व्‍यवहार में परिवर्तन दिखाई दे तब ये डिप्रेशन का रूप ले लेता है। व्‍यक्ति इनसे बाहर ना निकल पाये या बाहर निकलने में असमर्थ हो तब वह अवस्‍था अवसाद बन जाती है।

डिप्रेशन दवाओं  से ठीक हो जाता है- डिप्रेशन में दवाईयों की भूमिका सीमित होती है और एक अच्‍छे साइकोलॉजिस्‍ट या मनोवैज्ञानिक काउसंलर के मार्गदर्शन में ली जाने वाली थैरेपी बहुत असरकारक होती हैं। बहुत से मामलों में केवल काउंसिलिंग या साइकोथैरेपी से ही रोगी को डिप्रेशन से छुटकारा मिल जाता है। कुछ गंभीर मामलों में दवाईयां और साइको थैरेपी दोनों की जरूरत होती है।

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