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डिप्रेशन के बारे में कुछ गलत धारणाएं

डिप्रेशन से आज के समय में बहुत लोग प्रभावित हैं पर इसके बारे जानकारी बहुत ही कम है। कम जानकारी का होने से ही इसके बारे में लोगों में बहुत सी भ्रांतियां हैं। इसी कारण से इसको कई बार लोग हल्‍के में लेते हैं या मनमाफिक सलाह देने लगते हैं।

आजकल इस शब्‍द का प्रयोग भी इसी कारण ज्‍यादा होता हैं क्‍योंकि लोग जानते ही नहीं कि डिप्रेशन क्‍या है? अक्‍सर लोग कहते हुए मिलेंगे कि आज मैं बहुत डिप्रेश्‍ड हूं या कोई व्‍यक्ति किसी भी कारण से उदास है तो लोग कहेंगे कि वो अभी थोड़ा  Depressed है।

असल में Depression या अवसाद में  'थोड़ा' शब्‍द जोड़ना भी एक समस्‍या है जिसके कारण लोग इसे छोटी-मोटी समस्‍या मानते हैं और ज्‍यादा ध्‍यान नहीं देते। जबकि आज ये महामारी की तरह बढ़ रही है। किसी भी बीमारी के बारे में सही और जरूरी जानकारी का होना उसके उपचार में सहायक होता है। बीमारी के बारे में जानकारी के अभाव में मरीज समस्‍या तो बढ़ ही रही होती है, उसके परिवार या आसपास के लोग भी उसकी सहायता के बारे में जरूरी कदम नहीं उठा पाते।



आज हम कुछ ऐसे बिंदुओं पर बात करेंगे जिनके बारे में  स्‍पष्‍ट जानकारी होना बहुत जरूरी है उनके लिए जो खुद इस बीमारी से जूझ रहे हैं या उनसे जुड़ा कोई व्‍यक्ति इससे पीडि़त है।

डिप्रेशन कोई बड़ी बीमारी नहीं है- यह एक आम धारणा है इसके बारे में। इसका एक कारण ये भी है कि जो पीडि़त व्‍यक्ति है वह भी इसके बारे में किसी से ज्‍यादा चर्चा नहीं करता। उसके व्‍यवहार में परिवर्तन अवश्‍य होता है पर वह क्‍या महसूस कर रहा है इसकी चर्चा बहुत कम होती है। उसे लगता है कि लोग क्‍या कहेंगे अगर वह अपनी परेशानी शेयर करता है और डिप्रेशन के केसेज में मरीज असहाय ( Helpless ) महसूस करता है इसलिए उसकी परेशानी उसके अलावा कोई ऐसा व्‍यक्ति नहीं समझ पाता जो डिप्रेशन के बारे में ना जानता हो। इसलिए जिन्‍होंने इस समस्‍या का सामना ना किया हो उनकी ये राय बन जाती है कि ये एक गंभीर बीमारी नहीं है। जबकि अवसाद से ग्रस्‍त व्‍यक्ति आत्‍महत्‍या तक कर लेता है इसलिए इसे गंभीरता से लेना और उपचार शुरू करना बहुत जरूरी है वरना स्थिति भयावह हो सकती है।

डिप्रेशन पॉजिटिव सोचने से सही हो सकता है- कई बार डिप्रेशन से प्रभावित व्‍यक्ति खुद भी ऐसा ही सोचता है पर ऐसा करना उसकी मदद नहीं कर पाता। डिप्रेशन के बारे में ऐसा सोचना या किसी से ऐसा कहना उसकी समस्‍या को अक्‍सर बढ़ा ही रहा होता है। चूंकि यह एक बीमारी है और कोई छोटी-मोटी बीमारी नहीं है तो इसका निदान भी इसे बीमारी समझकर ही करना चाहिए। जब तक हम सही कदम नहीं उठाते इसे ठीक करने के लिए तब तक इस तरह की बातों से हमें कोई मदद नहीं मिल सकती।

डिप्रेशन कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाता है- ज्‍यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता है और ऐसा सोचकर हम एक ऐसे व्‍यक्ति जिसको सहायता की और इलाज की जरूरत है उसकी मदद करने की बजाय उसे उसके हाल पर छोड़ देते हैं। इसे भी हमें अन्‍य बीमारियों की तरह ही लेना चाहिए, शारीरिक बीमारियों और मानसिक बीमारी के उपचार के तरीके कुछ अलग हो सकते हैं जैसे शारीरिक बीमारी में दवाईयां ज्‍यादा सहायता करती हैं जबकि इसमें मानसोपचार ( Pychotherapy ) या काउंसलिंग ( Psychological Counselling ) बहुत मदद करती है।

उदासी, दुख आदि डिप्रेशन ही हैं- उदास होना, दुखी होना,मन ना लगना इस तरह की भावनाएं हर किसी के जीवन में आती हैं पर डिप्रेशन इससे कहीं बढ़कर है। डिप्रेशन के कुछ लक्षणों में से यह भी हैं पर जब ये भावनाएं लंबे समय तक बनी रहें और व्‍यक्ति की दिनचर्या, सामान्‍य कार्यकलाप व व्‍यवहार में परिवर्तन दिखाई दे तब ये डिप्रेशन का रूप ले लेता है। व्‍यक्ति इनसे बाहर ना निकल पाये या बाहर निकलने में असमर्थ हो तब वह अवस्‍था अवसाद बन जाती है।

डिप्रेशन दवाओं  से ठीक हो जाता है- डिप्रेशन में दवाईयों की भूमिका सीमित होती है और एक अच्‍छे साइकोलॉजिस्‍ट या मनोवैज्ञानिक काउसंलर के मार्गदर्शन में ली जाने वाली थैरेपी बहुत असरकारक होती हैं। बहुत से मामलों में केवल काउंसिलिंग या साइकोथैरेपी से ही रोगी को डिप्रेशन से छुटकारा मिल जाता है। कुछ गंभीर मामलों में दवाईयां और साइको थैरेपी दोनों की जरूरत होती है।

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